रोना_हो_तो_पढ़े
निशा काम निपटा कर बैठी ही थी की फोन की घंटी बजने लगी।मेरठ से विमला चाची का फोन था ,”बिटिया अपने बाबू जी को आकर ले जाओ यहां से। बीमार रहने लगे है , बहुत कमजोर हो गए हैं। हम भी कोई जवान तो हो नहीं रहें है,अब उनका करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। वैसे भी आखिरी समय अपने बच्चों के साथ बिताना चाहिए।”
निशा बोली,”ठीक है चाची जी इस रविवार को आतें हैं, बाबू जी को हम दिल्ली ले आएंगे।” फिर इधर उधर की बातें करके फोन काट दिया।
बाबूजी तीन भाई है , पुश्तैनी मकान है तीनों वहीं रहते हैं। निशा और उसका छोटा भाई विवेक दिल्ली में रहते हैं अपने अपने परिवार के साथ। तीन चार साल पहले विवेक को फ्लैट खरीदने की लिए पैसे की आवश्यकता पड़ी तो बाबूजी ने भाईयों से मकान के अपने एक तिहाई हिस्से का पैसा लेकर विवेक को दे दिया था, कुछ खाने पहनने के लिए अपने लायक रखकर। दिल्ली आना नहीं चाहते थे इसलिए एक छोटा सा कमरा रख लिया था जब तक जीवित थे तब तक के लिए। निशा को लगता था कि अम्मा के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए होंगे बाबूजी लेकिन वहां पुराने परिचितों के बीच उनका मन लगता था। दोनों चाचियां भी ध्यान रखती थी। दिल्ली में दोनों भाई बहन की गृहस्थी भी मज़े से चल रही थी।
रविवार को निशा और विवेक का ही कार्यक्रम बन पाया मेरठ जाने का। निशा के पति अमित एक व्यस्त डाक्टर है महिने की लाखों की कमाई है उनका इस तरह से छुट्टी लेकर निकलना बहुत मुश्किल है, मरीजों की बिमारी न रविवार देखती है न सोमवार। विवेक की पत्नी रेनू की अपनी जिंदगी है उच्च वर्गीय परिवारों में उठना बैठना है उसका , इस तरह के छोटे मोटे पारिवारिक पचड़ों में पड़ना उसे पसंद नहीं।
रास्ते भर निशा को लगा विवेक कुछ अनमना , गुमसुम सा बैठा है। वह बोली,”इतना परेशान मत हो, ऐसी कोई चिंता की बात नहीं है, उम्र हो रही है, थोड़े कमजोर हो गए हैं ठीक हो जाएंगे।”
विवेक झींकते हुए बोला,”अच्छा खासा चल रहा था,पता नहीं चाचाजी को एसी क्या मुसीबत आ गई दो चार साल और रख लेते तो। अब तो मकानों के दाम आसमान छू रहे हैं,तब कितने कम पैसों में अपने नाम करवा लिया तीसरा हिस्सा।”
निशा शान्त करने की मन्शा से बोली,”ठीक है न उस समय जितने भाव थे बाजार में उस हिसाब से दे दिए। और बाबूजी आखरी समय अपने बच्चों के बीच बिताएंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा।”
विवेक उत्तेजित हो गया , बोला,”दीदी तेरे लिए यह सब कहना बहुत आसान है। तीन कमरों के फ्लैट में कहां रखूंगा उन्हें। रेनू से किट किट रहेगी सो अलग, उसने तो साफ़ मना कर दिया है वह बाबूजी का कोई काम नहीं करेंगी | वैसे तो दीदी लड़कियां हक़ मांग ने तो बडी जल्दी खड़ी हो जाती हैं , करने के नाम पर क्यों पीछे हट जाती है। आज कल लड़कियों की शिक्षा और शादी के समय में अच्छा खासा खर्च हो जाता है।तू क्यों नहीं ले जाती बाबूजी को अपने घर, इतनी बड़ी कोठी है ,जिजाजी की लाखों की कमाई है?”
निशा को विवेक का इस तरह बोलना ठीक नहीं लगा। पैसे लेते हुए कैसे वादा कर रहा था बाबूजी से,”आपको किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो आप निसंकोच फोन कर देना मैं तुरंत लेकर आ जाऊंगा। बस इस समय हाथ थोड़ा तन्ग है।” नाममात्र पैसे छोडे थे बाबूजी के पास, और फिर कभी फटका भी नहीं उनकी सुध लेने।
निशा:”तू चिंता मत कर मैं ले जाऊंगी बाबूजी को अपने घर।” सही है उसे क्या परेशानी, इतना बड़ा घर फिर पति रात दिन मरीजों की सेवा करते है, एक पिता तुल्य ससुर को आश्रय तो दे ही सकते हैं।
बाबूजी को देख कर उसकी आंखें भर आईं। इतने दुबले और बेबस दिख रहे थे,गले लगते हुए बोली,”पहले फोन करवा देते पहले लेने आ जाती।” बाबूजी बोलें,” तुम्हारी अपनी जिंदगी है क्या परेशान करता। वैसे भी दिल्ली में बिल्कुल तुम लोगों पर आश्रित हो जाऊंगा।”
रात को डाक्टर साहब बहुत देर से आएं,तब तक पिता और बच्चे सो चुके थे। खाना खाने के बाद सुकून से बैठते हुएं निशा ने डाक्टर साहब से कहा,” बाबूजी को मैं यहां ले आईं हूं। विवेक का घर बहुत छोटा है, उसे उन्हें रखने में थोड़ी परेशानी होती।” अमित के एक दम तेवर बदल गए,वह सख्त लहजे में बोला,” यहां ले आईं हूं से क्या मतलब है तुम्हारा? तुम्हारे पिताजी तुम्हारे भाई की जिम्मेदारी है। मैंने बड़ा घर वृद्धाश्रम खोलने के लिए नहीं लिया था , अपने रहने के लिए लिया है। जायदाद के पैसे हड़पते हुए नहीं सोचा था साले साहब ने कि पिता की करनी भी पड़ेगी। रात दिन मेहनत करके पैसा कमाता हूं फालतू लुटाने के लिए नहीं है मेरे पास।”
पति के इस रूप से अनभिज्ञ थी निशा। “रात दिन मरीजों की सेवा करते हो मेरे पिता के लिए क्या आपके घर और दिल में इतना सा स्थान भी नहीं है।”
अमित के चेहरे की नसें तनीं हुईं थीं,वह लगभग चीखते हुए बोला,” मरीज़ बिमार पड़ता है पैसे देता है ठीक होने के लिए, मैं इलाज करता हूं पैसे लेता हूं। यह व्यापारिक समझोता है इसमें सेवा जैसा कुछ नहीं है।यह मेरा काम है मेरी रोजी-रोटी है। बेहतर होगा तुम एक दो दिन में अपने पिता को विवेक के घर छोड़ आओ।”
निशा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस पति की वह इतनी इज्जत करती है वें ऐसा बोल सकते हैं। क्यों उसने अपने भाई और पति पर इतना विश्वास किया? क्यों उसने शुरू से ही एक एक पैसा का हिसाब नहीं रखा? अच्छी खासी नौकरी करती थी , पहले पुत्र के जन्म पर अमित ने यह कह कर छुड़वा दी कि मैं इतना कमाता हूं तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है। तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी आराम से घर रहकर बच्चों की देखभाल करो।
आज अगर नौकरी कर रही होती तो अलग से कुछ पैसे होते उसके पास या दस साल से घर में सारा दिन काम करने के बदले में पैसे की मांग करती तो इतने तो हो ही जाते की पिता जी की देखभाल अपने दम पर कर पाती। कहने को तो हर महीने बैंक में उसके नाम के खाते में पैसे जमा होते हैं लेकिन उन्हें खर्च करने की बिना पूछे उसे इजाज़त नहीं थी।भाई से भी मन कर रहा था कह दे शादी में जो खर्च हुआ था वह निकाल कर जो बचता है उसका आधा आधा कर दे।कम से कम पिता इज्जत से तो जी पाएंगे। पति और भाई दोनों को पंक्ति में खड़ा कर के बहुत से सवाल करने का मन कर रहा था, जानती थी जवाब कुछ न कुछ तो अवश्य होंगे। लेकिन इन सवाल जवाब में रिश्तों की परतें दर परतें उखड़ जाएंगी और जो नग्नता सामने आएगी उसके बाद रिश्ते ढोने मुश्किल हो जाएंगे। सामने तस्वीर में से झांकती दो जोड़ी आंखें जिव्हा पर ताला डाल रहीं थीं।
अगले दिन अमित के हस्पताल जाने के बाद जब नाश्ता लेकर निशा बाबूजी के पास पहुंची तो वे समान बांधे बैठें थे।उदासी भरे स्वर में बोले,” मेरे कारण अपनी गृहस्थी मत ख़राब कर।पता नहीं कितने दिन है मेरे पास कितने नहीं। मैंने इस वृद्धाश्रम में बात कर ली है जितने पैसे मेरे पास है, उसमें मुझे वे लोग रखने को तैयार है। ये ले पता तू मुझे वहां छोड़ आ , और निश्चित होकर अपनी गृहस्थी सम्भाल।”
निशा समझ गई बाबूजी की देह कमजोर हो गई है दिमाग नहीं।दमाद काम पर जाने से पहले मिलने भी नहीं आया साफ़ बात है ससुर का आना उसे अच्छा नहीं लगा। क्या सफाई देती चुप चाप टैक्सी बुलाकर उनके दिए पते पर उन्हें छोड़ने चल दी। नजरें नहीं मिला पा रही थी,न कुछ बोलते बन रहा था। बाबूजी ने ही उसका हाथ दबाते हुए कहा,” परेशान मत हो बिटिया, परिस्थितियों पर कब हमारा बस चलता है। मैं यहां अपने हम उम्र लोगों के बीच खुश रहूंगा।”
तीन दिन हो गए थे बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़कर आए हुए। निशा का न किसी से बोलने का मन कर रहा था न कुछ खाने का। फोन करके पूछने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी वे कैसे हैं? इतनी ग्लानि हो रही थी कि किस मुंह से पूछे। वृद्धाश्रम से ही फोन आ गया कि बाबूजी अब इस दुनिया में नहीं रहे।दस बजे थे बच्चे पिकनिक पर गए थे आठ नौ बजे तक आएंगे, अमित तो आतें ही दस बजे तक है। किसी की भी दिनचर्या पर कोई असर नहीं पड़ेगा, किसी को सूचना भी क्या देना। विवेक आफिस चला गया होगा बेकार छुट्टी लेनी पड़ेगी।
रास्ते भर अविरल अश्रु धारा बहती रही कहना मुश्किल था पिता के जाने के ग़म में या अपनी बेबसी पर आखिरी समय पर पिता के लिए कुछ नहीं कर पायी। तीन दिन केवल तीन दिन अमित ने उसके पिता को मान और आश्रय दे दिया होता तो वह हृदय से अमित को परमेश्वर का मान लेती।
वृद्धाश्रम के सन्चालक महोदय के साथ मिलकर उसने औपचारिकताएं पूर्ण की। वह बोल रहे थे,” इनके बहू , बेटा और दमाद भी है रिकॉर्ड के हिसाब से।उनको भी सूचना दे देते तो अच्छा रहता।वह कुछ सम्भल चुकी थी बोली, नहीं इनका कोई नहीं है न बहू न बेटा और न दामाद।बस एक बेटी है वह भी नाम के लिए ।”
सन्चालक महोदय अपनी ही धुन में बोल रहे थे,” परिवार वालों को सांत्वना और बाबूजी की आत्मा को शांति मिले।”
निशा सोच रही थी ‘ बाबूजी की आत्मा को शांति मिल ही गई होगी। जाने से पहले सबसे मोह भंग हो गया था। समझ गये होंगे कोई किसी का नहीं होता, फिर क्यों आत्मा अशान्त होगी।’
” हां, परमात्मा उसको इतनी शक्ति दें कि किसी तरह वह बहन और पत्नी का रिश्ता निभा सकें | “
शायद ही कोई इसे पढ़े । फिर भी एक उम्मीद के साथ ।
बच्चो से प्यार खुब करो पर अपना हमैशा सोच कर चले
मैं चुप नहीं रहूंगी..
मोनिका की जब आंख खुली तब उसका शरीर बुरी तरह टूट रहा था । कुछ अजीब सा एहसास होने पर उसने अपने शरीर पर पड़ी चादर हटायी । वह पूरी तरह र्निवस्त्र थी । उसके कपड़े डबल-बेड के एक कोने में पड़े थे ।
यह सब कैसे हो गया ? वह यहां कैसे आ गयी ? वह तो....वह तो...अमन को अपने नोट्स दिखाने उसके घर आयी थी । अमन ! अमन कहां गया ? क्या उसे नहीं मालूम कि उसके साथ यह सब क्या हो गया ? कहीं इस सबके पीछे उसी का हाथ तो नहीं ? नहीं - नहीं अमन ऐसा नहीं कर सकता । वह तो उससे प्यार करता है । फिर, यह सब किसने और कैसे किया ?
मोनिका का दिमाग चकरा कर रह गया । उसके सोचने समझने की शक्ति समाप्त होती जा रही थी । किसी तरह अपने टूटते शरीर को संभालते हुये वह बिस्तर से उतरी । कपड़े पहनने के बाद उसने बेड-रूम का दरवाजा खोलने की कोशिश की लेकिन वह बाहर से बंद था । उसने कई बार दरवाजा थपथपाया लेकिन कोई आहट नहीं मिली । परेशान मोनिका लस्त-पस्त सी वहीं रखे सोफे पर गिर पड़ी ।
अमन एक प्रभावशाली मंत्री दीनानाथ चैधरी का एकलौता बेटा और उसका सहपाठी था । दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे । अमन तो कई बार उससे अपने प्यार का इजहार कर चुका था । वह उसे मंहगे होटलों में घुमाने ले जाना चाहता था लेकिन मोनिका अभी अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर केन्द्रित किये हुये थी । उसका लक्ष्य सिविल - सर्विस में जाने का था । इसलिये कैरियर बनने के बाद ही वह इन सब बातों के बारे में सोचना चाहती थी ।
अमन अक्सर कालेज नहीं आता था तब मोनिका उसे अपने नोट्स दे देती थी । इस बार अमन एक सप्ताह तक कालेज नहीं आया । मोनिका ने फोन किया तो पता चला कि उसे वायरल है । वह आज ही कालेज आया था । मोनिका ने जब उसे अपने नोट्स दिये तो उसने कहा,‘‘मोनिका, मुझे बहुत कमजोरी लग रही है । प्लीज़ आज मेरे घर चल कर मेरे नोट्स तैयार करवा दो । इसी बहाने मम्मी से भी तुम्हारी मुलाकात हो जायेगी ।’’
मोनिका तैयार हो गयी । अमन की कार में जब वह उसके घर पहुंची तो अमन ने बताया कि मम्मी मंदिर गयीं है । दस-पांच मिनट मे आती होंगी । उसने फ्रिज से निकाल कर उसे कोल्ड-ड्रिंक्स दी जिसको पीने के बाद उसका सिर चकराने लगा था । उसके बाद क्या कुछ हुआ मोनिका को याद नहीं आ रहा था ।
किंतु तस्वीर अब बिल्कुल साफ हो चुकी थी । उसकी अस्मत से खिलवाड़ अमन ने ही किया था । उस अमन ने जिससे वह प्यार करती थी । मोनिका की आंखो से आंसू बह निकले । अपने शरीर को संभालते हुये वह एक बार फिर उठी और पूरी शक्ति से दरवाजा पीटने लगी ।
इस बार दरवाजा खुल गया । सामने ही अमन खड़ा था । उसकी आंखे नशे से लाल थीं । उसे देखते ही मोनिका उसके सीने पर घूंसे बरसाते हुये फफक पड़ी,‘‘अमन, यह क्या किया तुमने ?’’
‘‘प्यार किया है । जी भर कर तुम्हें प्यार किया है ’’ अमन मुस्कराया ।
‘‘यह प्यार नहीं है । यह पाप है ’’ मोनिका ने सिसकी भरी ।
‘‘अरे पगली, यही सच्चा प्यार है जो एक लड़का एक लड़की से करता है ’’ अमन ने मोनिका की ठुढ्ढी को उपर उठाये हुये उसकी कोपलों को चूमा ।
मोनिका ने अपनी अश्रुपूरित पलकों को उठा कर अमन के चेहरे की ओर देखा फिर उसके चौड़े सीने पर सिर टिकाते हुये बोली,‘‘अमन, अब मुझसे शादी कर लो ।’’
जैसी बिजली का झटका लगा हो । अमन ने मोनिका को अपने सीने से अलग कर दिया और उसकी दोनों बाहों को पकड़ते हुये बोला,‘‘मैं तुमसे प्यार करता हूं और करता रहूंगा । मेरे पास इतने पैसे है कि तुम्हें हमेशा खुश भी रखूंगा लेकिन यह शादी - वादी का ख्वाब देखना छोड़ दो । यह संभव नहीं है ।’’
जैसे तुषार-पात हुआ हो । मोनिका ने अपने को अमन की बाहों से छुड़ा लिया और भर्राये स्वर में बोली,‘‘इसका मतलब तुम पैसे के बल पर मुझे अपनी रखैल बनाना चाहते हो ।’’
‘‘छी...छी...यह तो बहुत गंदा शब्द है । मैं तुम्हें रखैल नहीं बल्कि तुम्हारा कैरियर बनाना चाहता हूं । मेरे डैडी के इतने कान्टैक्ट हैं कि मैं तुम्हें जमीन से उठा कर आसमान पर पहुंचा दूंगा ’’ अमन ने मोनिका का हाथ थाम लिया ।
‘‘बहुत बड़ी गलतफहमी है तुम्हें अपने बाप के पैसे और उनके कान्टैक्ट के बारे में ’’ मोनिका ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और फुंफकारती हुयी बोली,‘‘तुमने गलत जगह हाथ डाल दिया है । मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं । पुलिस में तुम्हारे खिलाफ रिर्पोट लिखवाउंगी ।’’
‘‘फिर वही मिडिल क्लास मेंटेलेटी ’’ रमन बेशर्मी से मुस्कराया फिर बोला,‘‘ मुझे यकीन था कि तुम कुछ ऐसा ही कर सकती हो इसलिये मैनें उसका भी प्रबंध कर रखा है ।’’
इतना कह कर उसने अपना मोबाईल निकाला और उसे मोनिका की ओर बढ़ाते हुये बोला,‘‘इत्मिनान से देख लो । इसमें सारे कांड की वीडियो क्लिपिंग मौजूद है । अगर तुमने कोई भी मूर्खता की तो इसकी कापी सबसे पहले तुम्हारे घर वालों के पास पहुंचेगी फिर पूरे शहर में । उसके बाद अपनी बर्बादी की जिम्मेदार तुम स्वयं होगी ।’’
मोनिका ने उस वीडियो क्लिपिंग की एक झलक देखी तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गयी । उसे अपनी टांगे कांपती हुयी महसूस हुयी और वह एक बार फिर उस कमरे में रखे सोफे पर गिर पड़ी ।
‘‘कोई जल्दी नहीं है । इत्मिनान से इसे देख लो फिर अपना फैसला सुनाना । मैं इंतजार करूंगा ’’ रमन मोबाईल मोनिका के हाथों में थमा कर बाहर चला गया ।
मोनिका के अंतर्मन में हाहाकर मचा था । उसका रोम-रोम कांप रहा था । अपनी बेबसी पर एक बार फिर उसके आंसू निकल आये । वह समझ गयी थी कि अब इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकल पाना संभव नहीं था । उसे अमन के ईशारों पर नाचना ही होगा । उसे अमन की ‘सैक्स-स्लेव’ बनना ही पड़ेगा ।
‘सैक्स-स्लेव’! मोनिका की सोच को झटका लगा । वह देश की सबसे शक्तिशाली सेवा सिविल-सर्विसेज़ की तैयारी कर रही थी । एक दिन प्रशासन की बागडोर थामना उसका सपना था और वह एक गुंडे के सामने हार मान ले ? नहीं वह इतनी कमजोर नहीं है । वह इसका मुकाबला करेगी । उसके साथ जो अन्याय हुआ है उसका प्रतिकार करेगी ।
मोनिका की धमनियों का खून खौलने सा लगा । उसके जबड़े भिंच गये । अपने आंसू पोंछते हुये वह दूसरे कमरे में पहुंची । वहां अमन बहुत इत्मिनान से मेज पर टांगे फैलाये बियर पी रहा था ।
‘‘स्वीट हार्ट, क्या फैसला लिया ?’’ अमन ने मुस्कराते हुये पूछा ।
‘‘फैसला लेना इतना आसान नहीं है ’’ मोनिका ने शांत स्वर में कहा फिर बोली,‘‘अगर हो सके तो इस वीडियो की एक कापी मुझे भी दे दो । उसे घर पर इत्मिनान से देखने के बाद ही मैं कोई फैसला ले सकूंगी ।’’
‘‘वीडियो की कापी क्या , मेरी तरफ से तोहफा समझ कर तुम यह खूबसूरत मोबाईल ही रख लो । वीडियो की मेरे पास दूसरी कापी मौजूद है ’’ अमन ने कंधे उचकाये फिर एक-एक शब्द पर जोर देते हुये बोला,‘‘तुम्हारी इज्जत अब तुम्हारे ही हाथ में है । मुझे विश्वाश है कि तुम सही फैसला ही लोगी ।’’
मोनिका ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया और मोबाईल लेकर बाहर निकल आयी ।
घर पर मम्मी-पापा उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे । उसे देखते ही मम्मी ने घबराये स्वर में कहा,‘‘बेटी, बहुत देर कर दी । कहां रह गयी थी ?’’
‘‘मम्मी, अमन ने मेरे साथ रेप कर दिया है ’’ मोनिका ने बताया । उसका चेहरा इस समय भावना शून्य हो रहा था ।
‘‘क्या कर दिया ?’’मम्मी को अपने सुने पर विश्वाश नहीं हुआ ।
‘‘मेरा रेप कर दिया है ’’ मोनिका के होंठ यंत्रवत हिले ।
‘‘क्या कहा तूने ? क्या कर दिया है ?’’ मम्मी को अभी भी अपने सुने पर विश्वाश नहीं हो रहा था।
‘‘कितनी बार बताउं कि अमन ने मेरा रेप कर दिया है । रेप...रेप यानि बलात्कार ’’ मोनिका झल्ला सी उठी ।
‘‘हाय, बेहया, बेशर्म, बेगैरत । मुंह काला करके आ रही है और बता ऐसे रही है जैसे बहुत बड़ा ईनाम जीत कर आ रही है । यह सब बताते हुये तुझे लज्जा नहीं आयी ’’ मम्मी ने रोते हुये मोनिका पर थप्पड़ो की बरसात कर दी ।
‘‘मम्मी, मुंह मैनें नहीं बल्कि अमन ने काला किया है । लज्जा मुझे नहीं बल्कि उसे अपने कुकर्मो पर आनी चाहिये ’’मोनिका ने पीछे हट मम्मी के वार से अपने को बचाया फिर बोली,‘‘मुझे ब्लैक-मेल करने के लिये उसने वीडियो भी बनायी है । मैं उसकी एक कापी ले आयी हूं। वही उसके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत होगा । मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलिये । मुझे उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवानी है ।’’
‘‘बेटा, जो हुआ है उसे भूल जा । रिपोर्ट लिखवाने से पूरे खानदान की नाक कट जायेगी । हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगें ’’ मम्मी ने रोते हुये मोनिका को अपने सीने से लिपटा लिया और उसकी पीठ सहलानी लगीं ।
‘‘मम्मी, अगर रिपोर्ट लिखवायी तो हम लोग नहीं बल्कि वे लोग किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगें । नाक हमारी नहीं बल्कि उनकी कटेगी’’ मोनिका ने अपने को अलग किया फिर बोली,‘‘अगर रिपोर्ट नहीं लिखवायी तो मैं घुट-घुट कर जीती रहूंगी । सोते-जागते उस अपराध की सजा भुगतूंगी जो मैने नहीं बल्कि किसी और ने किया है ।’’
‘‘तू समझती क्यूं नहीं । हम लड़की वाले हैं । बदनामी हमेशा लड़की की ही होती है’’ इतना कह कर मम्मी अपने पति किशोर दयाल की ओर मुड़ीं और तड़पते हुये बोलीं,‘‘आप मौन क्यूं खड़े हैं ? इसको समझाते क्यूं नहीं ?’’
किशोर दयाल अब तक हतप्रभ से खड़े थे । अचानक वे चैंक से पड़े और मोनिका के सिर पर हाथ फेरते हुये बोले,‘‘ बेटा, जो हुआ उसे भूल जा । पुलिस-वुलिस तक जाना ठीक नहीं है ।’’
‘‘पापा, यह आप कह रहे है जिन्होंने मुझे हमेशा अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखलाया है ’’ मोनिका तड़प उठी फिर बोली,‘‘छै महीने पहले उचक्कों ने मम्मी की चेन खींच ली थी तब आप पुलिस के पास गये थे या नहीं ? ’’
‘‘बेटा, चेन लुटने और इज्जत लुटने में फर्क होता है ’’ पापा का दर्द उनके स्वर में छलक आया ।
‘‘क्या फर्क है ?’’मोनिका का स्वर उत्तेजना से कांप उठा,‘‘ मेरा शील भंग हुआ है । अगर मेरा कोई और अंग भंग हुआ होता, हाथ-पैर टूटे टूटे होते तो क्या आप मुझे डाक्टर और पुलिस के पास नहीं ले जाते ?’’
‘‘जो तू कह रही है, वह सब सच है । मगर वे सब बहुत प्रभावशाली लोग हैं । अमन का बाप कैबनिट मंत्री है’’ पापा ने बेबसी से हाथ मले ।
‘‘इसका मतलब आप उनसे डर रहे हैं ?’’
‘‘मैं उनसे नहीं बल्कि तेरी इज्जत को डर रहा हूं ’’ पापा ने कहा ।
‘‘कौन सी इज्जत ! जिसे देखा नहीं जा सकता, जिसे नापा नहीं जा सकता, उसे बचाने की खातिर मैं हार नहीं मानूंगी । अगर आप लोग मेरा साथ नहीं दे सकते तो मैं अकेले पुलिस स्टेशन जा रही हूं । मैं हर हाल में अमन को उसके किये की सजा दिलवाउंगी । मैं लड़की हूं यह सोच कर चुप नहीं रहूंगी ’’ मोनिका ने कहा और दरवाजे की ओर मुड़ पड़ी ।
किशोर दयाल ने दरवाजे तक पहुंच चुकी मोनिका को देखा फिर लड़खड़ाते कदमों से उसके पीछे आते हुये बोले,‘‘रूक जा बेटी, मैं तेरे साथ हूं ।’’
पुलिस इंस्पेक्टर ने ध्यान से उनकी बात सुनी फिर किशोर दयाल की ओर मुड़ते हुये बोला,‘‘ये आज कल की पीढ़ी बहुत जल्दी में है । सोचती है कि दुनिया को बदल देने की सारी जिम्मेदारी उनके कंधो पर ही है । भले ही मंुह के बल क्यूं न गिरें लेकिन रीति-रिवाजों को जरूर तोड़ेगें मगर आप तो पढ़े-लिखे और समझदार आदमी है । क्या आपको अंदाजा नहीं है कि आप कितनी बड़ी गल्ती करने जा रहे हैं ।’’
‘‘इंस्पेक्टर साहब, गल्ती हमने नहीं बल्कि अमन ने की है और उसे इसकी सजा मिलनी ही चाहिये । इसलिये आप उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखिये ’’ मोनिका ने कहा ।
‘‘मैडम, समझने की कोशिश करिये । रिपोर्ट-विपोर्ट लिखवाने से कुछ नहीं होगा । वह बहुत बड़े बाप का बेटा है । आप साबित नहीं कर पायेंगी कि उसने आपके साथ रेप किया है ’’ इंस्पेक्टर ने समझाने की मुद्रा में कहा ।
‘‘इसका सबूत तो यह वीडियो है जिसे उसने मुझे ब्लैक-मेल करने के लिये बनाया है ’’ मोनिका ने एक-एक शब्द पर जोर देते हुये कहा ।
‘‘अदालत में ऐसे सबूत चुटकियों में उड़ जायेंगे । उनका वकील साबित कर देगा कि यह ट्रिक फोटोग्राफी से बनायी गयी नकली वीडियो है जिसे माननीय मंत्री को बदनाम करने के लिये बनाया गया है । इसलिये मेरी राय मानिये, चुपचाप घर जाईये । बेकार में अपनी बदनामी करवाने से आपको कोई फायदा नहीं मिलने वाला ’’ इंस्पेक्टर ने समझाने की कोशिश की ।
‘‘इसका मतलब मंत्री जी के डर के कारण आप रिपोर्ट नहीं लिखेगें जबकि उसे लिखना आपकी ड्यूटी है’’ मोनिका का स्वर तेज हो गया ।
‘‘देख लड़की , तेरे साथ कुछ उल्टा-सीधा हुआ है इसलिये उतनी देर से समझा रहा हूं । चुपचाप घर चली जा । ज्यादा उछलेगी-कूदेगी तो हो सकता है कि कल की तारीख में तेरे ही खिलाफ रिपोर्ट लिख जाये कि मंत्री जी को ब्लैक-मेल करने के लिये तूने खुद उनके बेटे को फांस कर यह वीडियो बनवायी है । उसकी बाद तू न घर की रहेगी न घाट की ’’ इंस्पेक्टर का लहजा अचानक ही सख्त हो गया ।
‘‘आप इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं ?’’ मोनिका की आंखे एक बार फिर छलछला आयीं ।
‘‘मैं और भी बहुत कुछ कर सकता हूं जिसके बारे में तू सोच भी नहीं सकती’’ इंस्पेक्टर ने एक बार फिर सख्त स्वर में कहा फिर अचानक ही अपने स्वर को मुलायम बनाता हुआ बोला,‘‘तुम अभी बहुत छोटी हो इसलिये तुम्हें मालूम नहीं कि ये दुनिया कितनी जालिम है । मैं भी बीबी-बच्चों वाला हूं । उन्हें पालने के लिये मुझे भी नौकरी करनी है । इसलिये मंत्री के बेटे के खिलाफ मैं तो क्या कोई भी रिपोर्ट नहीं लिखेगा ।’’
सच्चाई से रूबरू हो मोनिका और किशोर दयाल पुलिस स्टेशन से निकल पड़े । वे दोनों पुलिस-कप्तान के पास भी गये मगर वे भी कोरी सहानभूति जताते रहे । सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्री के बेटे के खिलाफ रिपोर्ट लिखने का निर्देश देने का साहस उनमें भी न था ।
किशोर दयाल निराश हो चुके थे । मगर मोनिका हार मानने को तैयार न थी । कुछ सोच कर उसने कहा,‘‘पापा, आज-कल मीडिया सबसे सशक्त हथियार है । हम किसी बड़े अखबार के सम्पादक से मिलते हैं । अगर एक बार यह खबर छप जाये तो अमन का बाप उसे चाह कर भी नहीं बचा पायेगा ।’’
‘‘ठीक है ’’ किशोर दयाल ने सहमति जतायी ।
दोनों राजधानी के एक प्रमुख समचार-पत्र के सम्पादक के पास पहुंचे । पूरी बात सुन उसने बिना किसी लाग-लपेट के कहा,‘‘माफ कीजयेगा मैं इस आग में अपने हाथ नहीं जला सकता ।’’
‘‘यह आप क्या कर रहे हैं, सर । प्रेस और मीडिया को तो लोकतंत्र का चैथा खंभा कहा जाता है । अगर अन्याय के खिलाफ आप आवाज नहीं उठायेगंे तो और कौन उठायेगा ?’’ मोनिका ने विनती की ।
‘‘मैडम, हम चैथा खंभा जरूर हैं लेकिन हर खंभे को एक छत की जरूरत होती है । बिना छत के किसी खंभे का कोई वजूद नहीं होता है । आप लोगों को तीन या चार रूपये में जो अखबार मिलता है वह विज्ञापनों के दम पर ही इतना सस्ता पड़ता है । मैं इस स्कैंडल को उछाल कर अपने अखबार को बिना किसी छत के नहीं कर सकता । अखबार चलाने के लिये मुझे भी सरकारी विज्ञापनों की उतनी ही जरूरत है जितना जीवित रहने के लिये आक्सीजन की ’’ सम्पादक ने सत्य से परिचय करवाया ।
‘‘एक सीधी-सादी लड़की की इज्जत लुट गयी और आप इसे स्कैंडल कह रहे हैं ?’’ मोनिका का स्वर दर्द से भर उठा ।
‘‘एक बार तो आपकी इज्जत लुट चुकी है उसे और लुटाने पर क्यूं तुली है ? अगर ज्यादा शौक है तो किसी और अखबार को पकड़ लीजये और मुझे माफ कर दीजये’’ सम्पादक ने उन्हें बिदा करने के दृष्टि से हाथ जोड़ दिये ।
धीरे-धीरे शाम हो गयी थी । अंधेरा घिरने लगा था । एक ही दिन में जितने सत्य से परिचय हुआ था उसने मोनिका को बुरी तरह झकझोर दिया था । उसका शरीर बुरी तरह थक गया था । उसमें कम से कम आज किसी और के दरवाजे पर जाने की हिम्मत शेष नहीं बची थी ।
पापा का हाथ थामे वह चुपचाप घर लौट आयी । मम्मी अंधेरे में ही बैठी थी । किशोर दयाल ने आगे बढ़ कर लाईट जलायी तो मम्मी ने पूछा,‘‘क्या हुआ ?’’
प्रत्युत्तर में किशोर दयाल ने पूरी बात बतायी जिसे सुन मम्मी सिसकारी भर कर रह गयीं । काफी देर तक कमरे में मौन पसरा रहा फिर मम्मी ने पूछा,‘‘कुछ खाओगी ? ले आउं ?’’
‘‘हां मम्मी, खाउंगी । मुझे बहुत लंबी लड़ाई लड़नी है और भूखे पेट ज्यादा देर नहीं लड़ा जा सकता । इसलिये मैं खाउंगी । भर-पेट खाउंगी । जिस पाप में मेरी कोई गल्ती नहीं है उसके लिये शोक मना कर मैं खुद को नहीं जलाउंगी’’ मोनिका ने कहा ।
मम्मी ने कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी आंखो से आंसू छलक आये जिन्हें पोंछते हुये वे किचन की ओर चली गयीं । किशोर दयाल चुपचाप ही बैठे रहे । ऐसा लग रहा था जैसे उनके पास शब्द ही समाप्त हो गये हों ।
मम्मी थोड़ी ही देर में पराठे सेंक लायीं । उन्हें खाकर मोनिका ने प्लेट रखी ही थी कि उसके मोबाईल की घंटी बज उठी । उसने देखा कोई अन्जान नंबर था । उसने मोबाईल आन करते हुये कहा,‘‘हैलो ।’’
‘‘मिस मोनिका चैधरी बोल रही हैं ?’’उधर से एक गंभीर स्वर सुनायी पड़ा ।
‘‘जी, आप कौन ?’’
‘‘मैं अमन का बदनसीब बाप चैधरी दीनानाथ बोल रहा हूं ।’’
अचानक मोनिका की छठी इंद्रिय जागृत हो गयी । उसने तुरन्त मोबाईल का रिकार्डिंग मोड आन कर दिया और बोली,‘‘इसका मतलब आपके कुत्तों ने आप तक खबर पहुंचा दी ।’’
‘‘बेटी, तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ उसके लिये मुझे अफसोस है लेकिन जो बीत गया वह वापस नहीं आ सकता । इसलिये बीस लाख रूपये ले लो और इस मामले को यहीं समाप्त कर दो ’’मंत्री जी ने शांत स्वर में कहा ।
‘‘जरूर समाप्त कर दूंगी बस मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दीजये ।’’
‘‘कैसा प्रश्न ?’’
‘‘अगर यही घटना आपकी बेटी के साथ हुयी होती तो आप कितने रूपये लेकर यह मामला समाप्त करते ?’’
‘‘गुस्ताख लड़की , तुझे मालूम नहीं कि तू किसके साथ बात कर रही है ?’’ मंत्री महोदय चीख पड़े ।
‘‘अच्छी तरह से जानती हूं कि मैं एक बलात्कारी के बेईमान बाप से बात कर रही हूं ’’ मोनिका का भी स्वर तेज हो गया ।
‘‘तो यह भी जानती होगी कि अगर मैं एक ईशारा कर दूं तो तेरी लाश भी ढूढे नहीं मिलेगी । इसलिये जो दे रहा हूं उसे चुपचाप रख ले और अपना मुंह बंद कर । कल सुबह तक बीस लाख रूपये तेरे घर पहुंच जायेगें ’’ मंत्री जी दांत पीसते हुये बोले ।
मोनिका ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया । किशोर दयाल पूरी बात समझ गये थे । अतः समझाते हुये बोले,‘‘बेटा, वे बहुत प्रभावशाली लोग हैं । उनके खिलाफ कुछ नहीं हो सकता ।’’
‘‘पापा, मेरे खिलाफ अन्याय हुआ है । मैं चुप नहीं बैठूंगी ’’ मोनिका ने मुट्ठियां ।
‘‘तो तुम क्या करोगी ?’’
‘‘नहीं जानती, मगर मैं चुप नहीं रहूंगी ’’ मोनिका ने कहा और अपने कमरे में चली गयी ।
बिस्तर पर लेटे-लेटे वह काफी देर तक सोचती रही मगर तय नहीं कर पा रही थी कि क्या करे । पुलिस-प्रशासन-मीडिया कोई भी उसका साथ देने के लिये नहीं तैयार था । तो क्या उसे हार मान लेनी चाहिये ? नहीं वह हार नहीं मानेगी । तो फिर क्या करोगी ? इस प्रश्न का उत्तर उसके पास न था ।
सोशल मीडिया ! अचानक एक बिजली सी कौंधी । सोशल मीडिया की शक्ति असीमित है । उसे सोशल मीडिया का सहारा लेना चाहिये । किंतु क्या यह आत्मघाती कदम नहीं होगा ? क्या इससे उसकी अपनी आबरू तार-तार नहीं हो जायेगी ? कहीं वह लोगों के मनोरंजन का पात्र तो नहीं बन जायेगी ?
पूरी रात मोनिका बिस्तर पर करवटें बदलती रही मगर सुबह की किरणें फूटते-फूटते उसके मन में उजियाले की किरण फूट पड़ीं । उसे चोट पहुंची थी, उसकी अन्र्तआत्मा तक में घाव लगे थे और अपने घाव दूसरों को दिखलाने में कोई बुराई नहीं थी । एक कठोर निर्णय लेते हुये वह बिस्तर से उठ बैठी । लैपटाप पर उसने अपना फेसबुक एकाउन्ट खोला और लिखने लगी ।
‘सभी साथियों और शुभचिन्तकों को अबला कही जाने वाली स्त्री जाति की एक प्रतिनिधि का नमस्कार । मुझे क्षमा करियेगा । आज मैं वह दुसाहस करने जा रही हूं जो बहुत पहले किया जाना चाहिये था लेकिन आज तक किसी ने नहीं किया किन्तु किसी न किसी को कभी न कभी तो पहल करनी ही थी ।
इज्जत ! इज्जत क्या होती है ? इसका परिभाषा क्या है ? यह एक-पक्षीय क्यूं होती है ? यह हमेशा स्त्री की ही क्यूं लुटती है ? लुटेरे की इज्जत अखंडित क्यूं रहती है ? इस इज्जत की शुचिता और अखंडता की जिम्मेदारी केवल स्त्री के ही जिम्मे क्यूं ? क्या पुरूष के कौमार्य और उसकी मर्यादा को अच्छुण रखना आवश्यक नहीं ? यदि बलात्कार से स्त्री का शरीर अपवित्र हो जाता है तो उसे अपवित्र करने वाले पुरूष का शरीर पवित्र कैसे रह सकता है ? अपराधी के बजाय अपराध की सजा वह भुगते जिसके साथ अन्याय हुआ है यह कहां का न्याय है ?
यह वे प्रश्न हैं जिनके उत्तर बहुत पहले ही दिये जाने चाहिये थे । किन्तु ये प्रश्न अनुत्तरित रह गये इसीलिये पुरूष को जन्म देने वाली स्त्री आज भी पुरूषों के जुल्म सहने के लिये मजबूर है । कल मेरे साथ एक प्रभावशाली मंत्री के बेटे ने रेप किया । मैं हमेशा के लिये उसकी ‘सैक्स-स्लेव’ बन जाउं इसलिये उसने उस कुकर्म की वीडियो भी बना ली । ऐसी स्थित में एक स्त्री के पास दो ही रास्ते बचते हैं । पहला यह कि वह कुकर्मियों के ईशारे पर नाचे और दूसरा यह कि वह आत्महत्या कर ले । मगर मैनें तीसरा रास्ता चुना है । अपने बलात्कार का वीडियो मैं खुद अपलोड कर रही हूं । क्योंकि मंत्री के भय से पुलिस-प्रशासन-मीडिया कोई भी मेरी मदद करने के लिये तैयार नही है । हो सकता है कि इसके बाद दुनिया मेरी नग्नता पर चटखारे ले लेकिन अपने बलात्कारियों के सामने नित्य र्निवस्त्र होकर जिल्लत भरी जिंदगी जीने से शायद यह कम शर्मनाक होगा । कोई भी निर्णय लेने से पहले आप लोग इतना अवश्य सोचियेगा कि अगर मेरे साथ बलात्कार हुआ है तो इसमें मेरा दोष क्या है ? मैं मुंह छुपाती क्यूं फिरू ? मैं आत्महत्या क्यूं करूं ? मैने तय किया है कि मैं चुप नहीं रहूंगी । अगर आपको मेरी बात जायज लगे तो मेरी आवाज के साथ आप अपनी आवाज जरूर मिलाईयेगा । वरना मुझे बेहया और बेशर्म ठहराने के लिये आप सब हमेशा की तरह स्वतंत्र है ।’’
इतना लिखने के बाद मोनिका ने अमन से मिले वीडियो क्लिपिंग और मंत्री दीनानाथ चैधरी की आडियो क्लिपिंग को फेसबुक पर अपलोड कर दिया । उसके बाद वहीं से उसे व्हाट्सअप के कई ग्रुपों पर फारवर्ड कर दिया ।
जैसे बहुत बड़ा बोझ सिर से उतर गया हो । मोनिका राहत की सांस लेते हुये बिस्तर पर लेट गयी । चंद पलों बाद ही वह किसी बच्चे की भांति नींद के आगोश में समा गयी ।
ऐसा भी भला कभी हो सकता है ? अकल्पनीय सत्य ! अविश्वनीय यथार्थ ! किसी ने सोचा भी न था कि बलात्कार का शिकार होने वाली लड़की मुंह छुपाने के बजाय अपने ही बलात्कार का वीडियो आन-लाईन कर देगी । चंद पलों में मोनिका का वीडियो और आडियो दोनों ही वायरल हो गये । हर गली, हर मोड़, हर दुकान, हर मकान, हर आफिस और हर फोरम पर उसके ही चर्चे हो रहे थे । पक्ष और विपक्ष में तर्क दिये जा रहे थे । एक इसे बेशर्मी करार देता तो दस लोग अद्म्य साहस ।
नारियों और नारी संगठनों के तो जैसे सब्र का बांध ही टूट गया हो । ‘मैं चुप नहीं रहूंगीं’ के बैनर और तख्ती लिये हर गली-कूचे से महिलाओं के जत्थे बाहर निकलने लगे । हजारों की भीड़ ने दीनानाथ चैधरी के बंगले को घेर लिया । दूसरे शहरों से भी महिलाओं की भीड़ मोनिका के समर्थन में उसके घर के बाहर जमा होने लगी । हर जुबान पर बस एक ही आवाज थी ‘मैं चुप नहीं रहूंगी ।’’
सहमते हुये चला हवा का एक झोंका देखते ही देखते प्रचंड तूफान का रूप धारण कर चुका था जिसके आगे सरकार के भी पैर उखड़ने लगे थे । दोपहर होते-होते दीनानाथ चैधरी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने और अमन को जेल भेजने की खबर आ गयी ।
‘‘साथियों, अगर किसी लड़की के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे मुंह नहीं छुपाना चाहिये । उसे अपनी आत्मा पर लगे घाव को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसे शरीर पर लगे दूसरे घावों को दिखाया जाता है । शर्मसार उसे नहीं बल्कि उसे होना चाहिये जिसने यह अपराध किया है । इसलिये जिस दिन आप सब चुप न रहने का निर्णय ले लेंगी उस दिन ये अपराध अपने आप रूक जायेगें ’’ मोनिका अपने घर के सामने जtमा स्त्रियों की भीड़ को संबोधित कर रही थी और सभी की आखों में उसके लिये प्रसंशा के भाव थे । उसने जो दिशा दिखलायी थी उसका अनुसरण करना ही अपनी सुरक्षा का सबसे सुरक्षित मार्ग था