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मजबूरी शायरी

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hmne kitne karz

ख़ुशियों की ख़ातिर हमने कितने क़र्ज़ उतार रक्खे हैं
ज़िंदगी फिर भी तूने हमपे कितने दर्द उतार रक्खे हैं
मासूम अगर होता तो सब मिलके लूट लेते
जाने किस अपने ने मेरे दुश्मन उतार रक्खे हैं
hmne kitne karz

kud bhatak rha hoon

मै क्या किसी को रास्ता दिखाऊंगा
मै तो खुद भटक रहा हूँ मंजिल की तलाश में
kud bhatak rha hoon

smajh me aajate hum

तसल्ली से पढा होता तो समझ मे आ जाते हम
कुछ पन्ने. बिना पढे ही पलट दिये होग तुमने
smajh me aajate hum

wo hme ek lahma

दिल से रोये मगर होंठो से मुस्कुरा बेठे
यूँ ही हम किसी से वफ़ा निभा बेठे
वो हमे एक लम्हा न दे पाए अपने प्यार का
और हम उनके लिये जिंदगी लुटा बेठे
wo hme ek lahma

dard badh jata hai

सोचते थे मिलेगा सुकून ऐ दिल उनसे मिलकर
पर दर्द और बढ़ जाता है उन्हें देखने के बाद
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