gair lagta hai

ग़ैर लगता है न अपनों की तरह मिलता है

तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है

वक़्त के साथ हालात बदल जाते हैं

ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है !!

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