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aurat ko har roop me dhalte huae dekha

औरत को हर रूप में ढलते हुए मैंने देखा है !
कभी माँ तो कभी बहन बनते हुऐ देखा है !
नहीं समजता तो समज ले क्या है उसका मरतबा !
उसके कदमो के नीचे जन्नत को मिलते देखा है !
ना कर पायेगा तू उस दर्द का भी क़र्ज़ अदा कभी !
जो दर्द तुजे जन्म देते हुए उस माँ ने सहा है !!