www.poetrytadka.com

Wo muje mehndi lage haath dikhakar royi

Wo muje mehndi lage haath dikhakar royi
वो मुझे मेहंदी लगे हाथ दिखाकर रोयी
मैं किसी और की हूँ,बस इतना बता कर रोयीं
शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे
वो मुझे पास अपने बिठाकर रोयीं,
दुःख का एहसास दिला कर रोयीं
कभी कहती थी मैं न जी पाऊँगी बिन तुम्हारे
और आज ये बात दोहरा कर रोयीं
मुझ से ज्यादा बिछुड़ने का गम था उसे
वक्त-ए-रुक्शांत,वो मुझे सीने से लगा कर रोयीं
मैं बेकसूर हूँ, कुदरत का फैसला हो ये
लिपट कर मुझसे बस वो इतना बता कर रोयीं
मुझ पर दुःख का पहाड़ एक और टुटा
जब वो मेरे सामने मेरे ख़त जलाकर रोयीं
मेरी नफरत और अदावत पिघल गयी एक पल में
वो बेवफा है तो, क्यों मुझे रुलाकर रोयीं ?
सब गिले-शिकवे मेरे एक पल में बदल गए
झील सी आँखों में जब आंसू सजाकर रोयीं
कैसे उसकी मोहब्बत पर शक करे ये दोस्तों
भरी महफ़िल में वो मुझे गले लगा कर रोयीं !!