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Insaniyat to aik hai

इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है

ये ज़िन्दगी इसको जीने के मक़सद अनेक है

 

ना खाई ठोकरे वो रह गया नाकाम 

ठोकरे खाकर सँभलने वाले अनेक हैं 

 

ना महलों में ख़ामोशी ना फूटपाथ पर 

क़ब्रिस्तान में ख़ामोशी से लेटे अनेक है 

 

बहुत चीख़ती है मेरे दिल की ख़ामोशी तन्हाई में 

ख़ामोशी अच्छी है कहते अनेक है 

 

रोये थे कभी उसकी याद में अकेले बैठकर 

आँखे मेरी लाल है कहते अनेक है 

 

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