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ghar ke bhedi bhed rhe hai

घर के भेदी भेद रहे ,अपनी ही थाली छेद रहे !
जो डाल पकड़ के झूले थे,उसी डाल को काट रहे !
अपनी बातें थोप रहे ,सीने में खंजर भोंक रहे !
सारी मर्यादा लांघ चुके,अपनों के खून से खेल रहे !!