www.poetrytadka.com

bujh gai shma parwane ki

ढल रही हैं ज़िन्दगी बुझ गई शमा परवाने की !
अब वजह जीने की नहीं मिलती यहाँ !
ज़नाब आपको अब भी पड़ी हैं मुस्कराने की !!