kavita kosh

Monday 17th of February 2020

Kavita kosh | Hindi kavita | कविता कोश | कविता कोश ग़ज़ल

zindagi ka har khwab pura nahi hota

जिंदगी का हर ख्वाब पूरा नहीं होता !

होता अगर तो शख्स अधूरा नहीं होता !

ख्वाहिशों की प्यास कभी बुझ नहीं पाती !

कभी रेतों में समंदर का बसेरा नहीं होता !

आंखों में जल रही है जबसे तेरी शमा !

मेरे रूह की गलियों में अंधेरा नहीं होता !

अश्कों से भीगो देता है हर रात जमीं को !

आसमा रोता ही रहता जो सबेरा नहीं होता !! 

Kavita Kosh कविता कोश

 

 

kavita kosh ladki nahi pri hao woh

ladki nahi pri hai woh

पूरी दुनिया जब बुरा-भला कह रही थी मुझे

तो I Love you कहा था उसने मुझे

जब दुनिया ने तोड़-मरोड़ कर रख दिया था मुझे

तो उसने सहारा देकर फिर से 

आगे बढ़ना सिखाया था मुझे

न जाने क्या देखा था उस पगली ने मुझमें 

जब परछाई ने भी साथ छोड़ दिया था मेरा, 

वो मेरे साथ पल-पल खड़ी थी न जाने क्यों 

मैं पूरी दुनिया से अलग लगा था उसे

जब सबकुछ हार गया था मैं, 

तो वो जीत बनकर साथ खड़ी थी मेरे

और देखते-देखते मेरे पूरे अस्तित्व में हीं समा गई वो

मैं उसका बन गया था, और मेरी बन गई थी वो

मुझे प्यार करते-करते खुद प्यार बन गई थी वो

तभी तो कहता हूँ, लड़की नहीं परी है वो

अब उसे बहुत प्यार करता हूँ मैं, 

वो जान है मेरी ये इकरार करता हूँ मैं

तभी तो कहता हूँ, लड़की नहीं परी है वो !!

Kavita Kosh कविता कोश

 

ye manzar kyu hai kavita kosh

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है

ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है

फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी

अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब 

वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

आँख से आँख मिला बात बनाता क्यूँ है

तू अगर मुझसे ख़फ़ा है तो छुपाता क्यूँ है

ग़ैर लगता है न अपनों की तरह मिलता है

तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है

वक़्त के साथ ख़यालात बदल जाते हैं

ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है

एक मुद्दत से जहां काफ़िले गुज़रे ही नहीं

ऐसी राहों पे चराग़ों को जलाता क्यूँ है !!

Kavita Kosh कविता कोश

ab verano me kavita kosh

रेंग रहे हैं साये अब वीराने में !

धूप उतर आई कैसे तहख़ाने में !

जाने कब तक गहराई में डूबूँगा !

तैर रहा है अक्स कोई पैमाने में !

उस मोती को दरिया में फेंक आया हूँ !

मैं ने सब कुछ खोया जिसको पाने में !

हम प्यासे हैं ख़ुद अपनी कोताही से !

देर लगाई हम ने हाथ बढ़ाने में !

क्या अपना हक़ है हमको मालूम नहीं !

उम्र गुज़ारी हम ने फ़र्ज़ निभाने में !

वो मुझ को आवारा कहकर हँसते हैं !

मैं भटका हूँ जिनको राह पे लाने में !

कब समझेगा मेरे दिल का चारागर !

वक़्त लगेगा ज़ख्मों को भर जाने में !

हँस कर कोई ज़ह्र नहीं पीता आलम !

किस को अच्छा लगता है मर जाने में !! 

Kavita Kosh कविता कोश

ab kisi ka koi kavita kosh

हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है

कोई तालिब कोई मतलूब नहीं होता है

अब तो पहली सी वह तहज़ीब की क़दरें न रहीं

अब किसी से कोई मरऊब नहीं होता है

अब गरज़ चारों तरफ पाँव पसारे है खड़ी

अब किसी का कोई महबूब नहीं होता है

कितने ईसा हैं मगर अम्न-व-मुहब्बत के लिये

अब कहीं भी कोई मस्लूब नहीं होता है

पहले खा लेता है वह दिल से लड़ाई में शिकस्त

वरना यूँ ही कोई मजज़ूब नहीं होता है !!

Kavita Kosh कविता कोश

 

daman me ky kuch hai kavita kosh

सुनी सुनाई बात नहीं है अपने ऊपर बीती है

फूल निकलते है शोलों से चाहत आग लगाए तो

झूठ है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है

अच्छा मेरा ख्व़ाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो

देर लगी आने में तुमको शुक्र है फिर भी आये तो

आस ने दिल का साथ न छोड़ा वैसे हम घबराए तो

शफ़क़, धनुक, महताब, घटाएँ, तारे, नग़मे, बिजली, फूल

उस दामन में क्या कुछ है, वो दामन हाथ में आए तो !!

Kavita Kosh कविता कोश

wah re jamane teri had ho gayi

Wah Re Jamane Teri Had Ho Gayi

कविता माँ पर, माँ पर हिंदी कविता

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई !

बीवी के आगे माँ रद्द हो गई !

बड़ी मेहनत से जिसने पाला !

आज वो मोहताज हो गई !

और कल की छोकरी 

तेरी सरताज हो गई !

बीवी हमदर्द और माँ सरदर्द हो गई !

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई !!

पेट पर सुलाने वाली,

पैरों में सो रही !

बीवी के लिए लिम्का,

माँ पानी को रो रही !

सुनता नहीं कोई, वो आवाज देते सो गई !

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई.!!

माँ मॉजती बर्तन,वो सजती संवरती है !

अभी निपटी ना बुढ़िया तू , उस पर बरसती है !

अरे दुनिया को आई मौत,तेरी कहाँ गुम हो गई !

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई !!

अरे जिसकी कोख में पला,

अब उसकी छाया बुरी लगती !

बैठ होण्डा पे महबूबा,

कन्धे पर हाथ जो रखती !

वो यादें अतीत की,

वो मोहब्बतें माँ की, सब रद्द हो गई !

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई !!

बेबस हुई माँ अब,

दिए टुकड़ो पर पलती है !

अतीत को याद कर,

तेरा प्यार पाने को मचलती है !

मुसीबत जिसने उठाई, वो खुद मुसीबत हो गई !

वाह रे जमाने तेरी हद हो गई !!

 ___ याद रखना ________

मां तो जन्नत का फूल है !

प्यार करना उसका उसूल है !

दुनिया की मोह्ब्बत फिजूल है !

मां की हर दुआ कबूल है !

मां को नाराज करना इंसान तेरी भूल है !

मां के कदमो की मिट्टी जन्नत की धूल है !!

Kavita Kosh कविता कोश

kavita kosh wo mila nahi

wo mila nahi kavita kosh

वो नही मिला तो मलाल क्या !

जो गुज़र गया सो गुज़र गया !

उसे याद करके ना दिल दुखा !

जो गुज़र गया सो गुज़र गया !

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए !

युँ ही रास्ते में जुदा हुए !

ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा !

जो गुज़र गया सो गुज़र गया !

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं !

नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं !

ना मलाल कर, मेरे साथ आ !

जो गुज़र गया सो गुज़र गया !

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं !

ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं !

वो तेरा हैं, उसको गले लगा ! 

जो गुज़र गया सो गुज़र गया !!

Kavita Kosh कविता कोश

kavita kosh hindi language

kavita kosh hindi language

तू शर्मीली सिमटी सी,है शोख़ तितली सी तू !

रेशम की नरमी सी,,जाड़ो की गर्मी सी तू !

रातो की काजल सी,तारों के आँचल सी तू !

तू बादल के बालो सी,दिन के उजालो सी तू !

दिलकश खयालो सी,रंगी ख्वाबो सी तू !

तेरे सवालो सी,मेरे जवाबो सी तू !

ओस में जैसे नहाईं,लबो पे खिली है मुस्कान !

तू हैं फ़रिश्तों के जैसी,रूह की है जैसे तू जान !

तुझ को जो पा जाऊं,होश में ना मैं आऊ !

तू झिलमिल बहारो सी,रिमझिम फ़ुहारों सी तू !

अनजाने यादो सी,पहचाने वादो सी तू !

वन की गुफ़ाओं सी,सातो शमाओं सी तू !

तू शर्मीली सिमटी सी,है शोख़ तितली सी तू !

रेशम की नरमी सी,जाड़ो की गर्मी सी तू  !!

Kavita Kosh कविता कोश

hindi prem kavita kosh

hindi prem kavita

वो मुझे मेहंदी लगे हाथ दिखाकर रोयी

मैं किसी और की हूँ,बस इतना बता कर रोयीं

शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे

वो मुझे पास अपने बिठाकर रोयीं,

दुःख का एहसास दिला कर रोयीं

कभी कहती थी मैं न जी पाऊँगी बिन तुम्हारे

और आज ये बात दोहरा कर रोयीं

मुझ से ज्यादा बिछुड़ने का गम था उसे

वक्त-ए-रुक्शांत,वो मुझे सीने से लगा कर रोयीं

मैं बेकसूर हूँ, कुदरत का फैसला हो ये

लिपट कर मुझसे बस वो इतना बता कर रोयीं

मुझ पर दुःख का पहाड़ एक और टुटा

जब वो मेरे सामने मेरे ख़त जलाकर रोयीं

मेरी नफरत और अदावत पिघल गयी एक पल में

वो बेवफा है तो, क्यों मुझे रुलाकर रोयीं ?

सब गिले-शिकवे मेरे एक पल में बदल गए

झील सी आँखों में जब आंसू सजाकर रोयीं

कैसे उसकी मोहब्बत पर शक करे ये दोस्तों

भरी महफ़िल में वो मुझे गले लगा कर रोयीं !!

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