kavita kosh

Kavita kosh | Hindi kavita | कविता कोश | कविता कोश ग़ज़ल

sath dena hai to

~~~~~साथ देना तो था~~~~~
थामने हम बढे, हाथ देना तो था
तुम मेरे हो,मेरा साथ देना तो था
हौसलों पर मेरे, यूँ गिरी ग़ाज़ क्यों
गीत गुमसुम रहे,खोये अलफ़ाज़ क्यों
साधने हम चले, आस देना तो था
तुम मेरे हो, मेरा साथ देना तो था
कोई राहत नहीं, कोई चाहत नहीं
है कहाँ वो ख़ुशी,कोई आहट नहीं
बेबसी को मेरी, मात देना तो था
तुम मेरे हो, मेरा साथ देना तो था
ख़ाब खो जाएंगे, ये तो सोचा न था
किस तरह ये कहें, दर्द होता न था
सूनी आँखें रहीं, ख़ाब देना तो था
तुम मेरे हो, मेरा साथ देना तो था
थामने हम बढे, हाथ देना तो था
तुम मेरे हो,मेरा साथ देना तो था

ye zindagi bhi ajeeb hai

यें ज़िन्दगी भी अजीब सी हैं ,

हर मोड़ पर अपना रंग बदल देती हैं

कोई अपने बेगाने हो जाते हैं ,

तो कोई पराया अपना हो जाता हैं

यें ज़िन्दगी भी अजीब सी हैं , 

हर मोड़ पर कुछ नया सिखाती हैं

कभी खुशिया भर -भर के आती है, 

तो कभी-कभी दुःख के 

बादल हर रोज बरसते हैं

यें ज़िन्दगी भी अजीब सी हैं ,

हर मोड़ पर एक नया मुकाम बनाती हैं

इस ज़िन्दगी से हर रोज 

किसी न किसी को 

शिकायत होती है ,तो कोई इसकी 

प्रशंसा करता हैं

यें ज़िन्दगी कभी खामोश रहती हैं ,

और कभी-कभी बिन कहे 

कुछ कह जाती हैं

यें ज़िन्दगी दुश्मनों के साथ रहकर, 

अपनों को धोका दे जाती हैं

यें ज़िन्दगी भी अजीब सी हैं , 

हर मोड़ पर एक नया रंग दे जाती हैं

kavita kosh कविता कोश

 

aahista chal ae zindagi

आहिस्ता चल जिंदगी,अभी 

कई कर्ज चुकाना बाकी है 

कुछ दर्द मिटाना बाकी है 

कुछ फर्ज निभाना बाकी है 

रफ़्तार में तेरे चलने से 

कुछ रूठ गए कुछ छूट गए 

रूठों को मनाना बाकी है 

रोतों को हँसाना बाकी है 

कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए 

कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए 

उन टूटे -छूटे रिश्तों के 

जख्मों को मिटाना बाकी है 

कुछ हसरतें अभी अधूरी हैं 

कुछ काम भी और जरूरी हैं 

जीवन की उलझ पहेली को 

पूरा सुलझाना बाकी है 

जब साँसों को थम जाना है 

फिर क्या खोना ,क्या पाना है 

पर मन के जिद्दी बच्चे को 

यह बात बताना बाकी है 

आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी 

कई कर्ज चुकाना बाकी है 

कुछ दर्द मिटाना बाकी है 

कुछ फर्ज निभाना बाकी है !

---------धन्यवाद --------

Kavita Kosh कविता कोश

dastan apni kavita kosh

मैं भी लिखूँगाी किसी रोज़, दास्तान अपनी

मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिखूँगी

 

लिखूँगा कोई शख्स, तो शहजादा-सा लिखूँगी

ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिखूँगी

 

बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू,

ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिखूँगी

 

मैं लिखूँगी तेरी रातों की, मासूम-सी नींद,

और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिखूँगी

 

हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना,

फिर भी यकीन मानो जान मुकम्मल तुझे ही अपनी जान लिखुगी

 

ये जानती हूँ मै कि तुझे झूठ से नफरत है,

इसलिए जो भी लिखूँगी, सब असल लिखूँगी

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jis roz

जिस रोज पैदा होते हैं हम, 

उस रोज बहुत खुशियां मनाई जाती है..

बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, 

सपनो की एक दुनिया सजाई जाती है..

खुशी और ग़म की आँखों से, 

ज़िन्दगी की तस्वीर दिखाई जाती है..

जिस रोज मरते हैं हम, 

उस रोज हमारी खूबियां बताई जाती है ।

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mere intezar me kavita kosh

वो दिन भी आयेगा मेरे इंतज़ार में 

जब तुम खडी होगी नज़रें बार बार 

रास्ते पर उठ रही होंगी घड़ी की सुईयां 

अटकी हुयी लगेंगी दिल की धडकनें 

बढ़ रही होंगी चेहरे पर पसीना 

माथे पर सलवटें होंगी तुम्हें उन हालात का 

अहसास होने लगेगा तुम्हारे इंतज़ार में 

जो मैंने सहा होगा प्रीत से मिलन की आस 

कुछ ऐसी ही होती है जिसने सही 

उसे ही महसूस होती है

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kya hoga kavita kosh

नज़र फ़रेब-ए-कज़ा खा गई तो क्या होगा;

हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा;

नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर;

नई सहर भी कजला गई तो क्या होगा;

न रहनुमाओं की मजलिस में ले चलो मुझको;

मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा;

ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ;

मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा;

शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारनेवालों;

ख़िज़ाँ-सिरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा;

ख़ुशी छीनी है तो ग़म का भी ऐतमाद न कर;

जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा।

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ek shabd hai

एक शब्द है ( मोहब्बत )

इसे कर के देखो तुम तड़प ना जाओ तो कहना,

एक शब्द है ( मुकद्दर )

इससे लड़कर देखो तुम हार ना जाओ तो कहना,

एक शब्द है ( वफा )

जमाने में नहीं मिलती कहीं ढूंढ पाओ तो कहना,

एक शब्द है ( आँसू )

दिल में छुपा कर रखो तुम्हारी आँखों से ना निकल जाए तो कहना,

एक शब्द है ( जुदाई )

इसे सह कर तो देखो तुम टूट कर बिखर ना जाओ तो कहना,

एक शब्द है ( ईश्वर )

इसे पुकार कर तो देखो सब कुछ पा ना लो तो कहना

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Tera Dedar Karoo

तू सामने रहे मेरे, मै तेरा दीदार करू,

सब कुछ भुला के, सिर्फ तुझे ही प्यार करू,

तेरी जुल्फों के साये मे जिन्दगी मिली

तेरी आँखों मे डूब के,ख़ुशी मिली,

तुझ से भी बढ़ कर तुझ पे ऐतबार करू,

तुम न थे दिल मे, कोई अरमान न था,

इस नाकाम जिन्दगी मे,कही मुकाम न था,

सफ़र के हर मोड़ पे,तेरा इन्तेजार करू,

वादा करो मुझ से,कभी दूर न जाओगे,

मेरे दिल को ख़ुशी देकर फिर न रुलाओगे,

मेरे सब कुछ तुम हो, तुझ पे जान निसार करू

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kavita kosh in hindi smundar sare

समंदर सारे शराब होते तो सोचो कितना बवाल होता !

हक़ीक़त सारे ख़्वाब होते तो सोचो कितना बवाल होता !

किसी के दिल में क्या छुपा है ये बस ख़ुदा ही जानता है !

दिल अगर बेनक़ाब होते तो सोचो कितना बवाल होता !

थी ख़ामोशी हमारी फितरत में तभी तो बरसो निभ गयी लोगो से !

अगर मुँह में हमारे जवाब होते तो सोचो कितना बवाल होता !

हम तो अच्छे थे पर लोगो की नज़र में सदा बुरे ही रहे !

कहीं हम सच में ख़राब होते तो सोचो कितना बवाल होता !!

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