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Hindi Stories

Pati Ka Anokha Pyaar

Pati Ka Anokha Pyaar
🌹🌿🌹🌿🌹पति का अनोखा प्यार🌹🌿🌹🌿🌹
एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की। शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी। वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था। लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skinDisease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी। खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी।

इस बीच एकदिन पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। काम ख़त्म कर जब वह घर वापस लौट रहा था, उसका accident हो गया। Accident में उसने अपनी दोनो आँखें खो दी। लेकिन इसके बावजूद भी उन दोनो की जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ती रही। समय गुजरता रहा और अपने चर्मरोग के कारण लड़की ने अपनी खूबसूरती पूरी तरह गंवा दी। वह बदसूरत हो गई, लेकिन अंधे पति को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। इसलिए इसका उनके खुशहाल विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह उसे उसी तरह प्यार करता रहा। एकदिन उस लड़की की मौत हो गई। पति अब अकेला हो गया था। वह बहुत दु:खी था. वह उस शहर को छोड़कर जाना चाहता था।

उसने अंतिम संस्कार की सारी क्रियाविधि पूर्ण की और शहर छोड़कर जाने लगा. तभी एक आदमी ने पीछे से उसे पुकारा और पास आकर कहा, “अब तुम बिना सहारे के अकेले कैसे चल पाओगे? इतने साल तो तुम्हारी पत्नितुम्हारी मदद किया करती थी.” पति ने जवाब दिया, “दोस्त! मैं अंधा नहीं हूँ। मैं बस अंधा होने का नाटक कर रहा था। क्योंकि यदि मेरी पत्नि को पता चल जाता कि मैं उसकी बदसूरती देख सकता हूँ, तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता। इसलिए मैंने इतने साल अंधे होने का दिखावा किया. वह बहुत अच्छी पत्नि थी. मैं बस उसे खुश रखना चाहता था।

सीख-- खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियों के प्रति आखे बंद कर लेनी चाहिए.. और उन कमियों को नजरन्दाज कर देना चाहिए।
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Maa beti ka rishta

Maa beti ka rishta
माँ-बेटी का रिश्ता
. मेरे पड़ोस में एक बारह साल की बच्ची रहती है। . पहले उसके व्यवहार से मुझे लगता था कि वह बहुत जिद्दी और घमंडी है। . उसके पापा साधारण सी कोई नौकरी करते है, पर उसकी हर इच्छा को जरुर पूरी करते है। . काफी मन्नतो के बाद उनके घर संतान हुई थी। . एक बार उसने अपने घर में नई चप्पल के लिये बखेरा खड़ा कर दिया। . उसके पापा को आज ही सैलरी मिली थी। . पापा ने काफी खूबसूरत चप्पल लाकर उसे दी।

. चप्पल लेकर वो काफी खुश थी। उस दिन उसने चप्पल पहन के खुब उछल-कुद की। . पर अगले दिन आश्चर्य चकित रह गया मैं, जब वो अपनी माँ से कह रही थी कि ये नई चप्पल मैँ नहीं पहनुंगी, मुझे अच्छी नहीं लग रही है। . पुराना वाली ज्यादा अच्छी है। . सुनकर थोड़ा गुस्सा आया मुझे, . फिर शाम को मेने उससे पूछा कि जब चप्पले नहीं पहननी थी, तो इतनी महँगी क्यों खरीदवाई .... . और एक दिन पूरा पहन के क्यों घूमी ?? . अब तो वापस भी नही हो सकती ये चप्पल...!!! . मेरी बात सुनकर वो हँसने लगी... . और बोली कि, भैया आप बुद्धु ही रह जाओगे..

. वो तो मम्मी की चप्पल घिस गई थी, नई चप्पल अपने लिये खरीदवा नहीं रही थी। . वो तो सारा प्यार मुझ पे लुटा देना चाहती है। . बस मै बहाने से चप्पल खरीदवा के पहन ली और इसलिये घूमी की दुकान वाले भैया को वापस ना की जा सके। . अब मम्मी उस चप्पल को पहन के कहीं भी आ जा सकेंगी। . इतनी कम उम्र मे माँ के लिये इतनी प्यारी सोच देख के मैं दंग रह गया।
. सच में माँ-बेटी का रिश्ता अनमोल है.

Ramlal Tum Apni Biwi

Ramlal Tum Apni Biwi
🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔
"रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो? "मैने अपने नौकर से पुछा।। "मै डरता नही साहब उसकी कद्र करता हूँ उसका सम्मान करता हूँ।"उसने जबाव दिया। मैं हंसा और बोला-" ऐसा क्या है उसमें। ना सुरत ना पढी लिखी।"

जबाव मिला-" कोई फरक नही पडता साहब कि वो कैसी है पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।" "जोरू का गुलाम।"मेरे मुँह से निकला।" और सारे रिश्ते कोई मायने नही रखते तेरे लिये।"मैने पुछा। उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया- "साहब जी माँ बाप रिश्तेदार नही होते। वो भगवान होते हैं।उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं।

भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं , दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है। आपका मेरा रिश्ता भी दजरूरत और पैसे का है पर, पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है अपने सारे रिश्ते को पीछे छोडकर। और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है आखिरी साँसो तक।" मै अचरज से उसकी बातें सुन रहा था। वह आगे बोला-"साहब जी, पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पुरा रिश्तों की भण्डार है। जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है , हमसे दुलार करती है तो एक माँ जैसी होती है।

जब वो हमे जमाने के उतार चढाव से आगाह करती है,और मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ क्योकि जानता हूँ वह हर हाल मे मेरे घर का भला करेगी तब पिता जैसी होती है। जब हमारा ख्याल रखती है हमसे लाड़ करती है, हमारी गलती पर डाँटती है, हमारे लिये खरीदारी करती है तब बहन जैसी होती है। जब हमसे नयी नयी फरमाईश करती है, नखरे करती है, रूठती है , अपनी बात मनवाने की जिद करती है तब बेटी जैसी होती है। जब हमसे सलाह करती है मशवरा देती है ,परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, झगडे करती है तब एक दोस्त जैसी होती है। जब वह सारे घर का लेन देन , खरीददारी , घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है तो एक मालकिन जैसी होती है।

और जब वही सारी दुनिया को यहाँ तक कि अपने बच्चो को भी छोडकर हमारे बाहों मे आती है तब वह पत्नी, प्रेमिका, अर्धांगिनी , हमारी प्राण और आत्मा होती है जो अपना सब कुछ सिर्फ हमपर न्योछावर करती है।" मैं उसकी इज्जत करता हूँ तो क्या गलत करता हूँ साहब ।" मैं उसकी बात सुनकर अकवका रह गया।।
एक अनपढ़ और सीमित साधनो मे जीवन निर्वाह करनेवाले से जीवन का यह मुझे एक नया अनुभव हुआ ।👫👫👫👫🌹🌹

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Tyag Hindi Story

Tyag Hindi Story
त्याग" मां की मृत्यु शोक मे इकट्ठा हुए लोगों के बीच पंडित जी ने घर की परांपरा को आगे बढाने के लिए घरवालों को बुलाया जिसमें मृत्यु के वंशज अपनी प्रिय वस्तु का त्याग करते थे ,सबसे पहले बडे बेटे ने कहा -वो अबसे लाल रंग के कपडे नही पहनेगा... सारी बिरादरी वाह वाह करने लगी वही गमगीन बुजुर्ग पिता सोचने लगे -बडा बेटा बडी कम्पनी के इतने बडे पद पर है जहां सिर्फ लाइट कलर पहने जाते है शायद ही उसे कभी लाल रंग के कपडे पहनने पडे, वाह मेरे बडे बेटे वाह... पंडित ने मंझले बेटे से तो वो बोला-मे आज से गुड नही खाऊंगा घरके सभी जानते है की उसे गुड से एलर्जी थी पर सबके आगे अपनी इज्जत बढाने का मौका मिल गया ऐसा कहकर और लगे हाथ त्याग भी हो गया ..बुजुर्ग पिता सोचने लगे जब मां बीमार थी तो तीनो बेटों मे से कोई उसके पास नही रहा ओर अब बिरादरी मे अपना रूतबा बना रहे है कितना खुश रहती थी कहती थी मुझे मरने पर चार कंधे मेरे अपने घर के होगे तीन मेरे बेटे के ओर चौथा मेरे पति का मगर ...

सब काम मे व्यस्त मेरे बेटे उसके अंतिम दर्शनो के लिए भी नही आये ,कितने यत्न करके विदेश मे भेजा था काम करने की उनकी इच्छाओं के लिए ...तभी सबसे छोटे बेटे को पंडित ने आवाज दी तुम कया त्याग करोगे बेटा.. छोटा बेटा- पंडित जी मे अपने समय का त्याग करूंगा .....हां आजसे मे अपने समय का त्याग करूंगा वो जो वक्त मे office से आकर मोबाइल टीवी और अन्य मंनोरंजन को देता था आजसे वो मेरे पिता का हुआ... मे अपने पिता को अपने साथ रखूंगा मेरे दो भगवानो मे से एक को खो चुका हूं... लेकिन दूसरे भगवान की इतनी सेवा करूंगा ताकि मुझे देखकर ओर बच्चो को समझ आ जाए कि उनकी असली दौलत ये रूपये पैसे नही उनके माता पिता है ओर वो भी ये अनमोल दौलत कभी ना खोये सहजकर रखे..मे बदनसीब हूं जो अपनी अनमोल दौलत मे एक नायाब कोहिनूर हीरा अपनी मां को खो चुका हूं ओर रोते हुए छोटा बेटा अपने पिता के पैरों मे गिर गया,

सभी कार्य निपटने के बाद छोटा बेटा पिता को अपने घर ले गया जहां पिता कुछ दिनों बाद खुश रहने लगे थे बस पत्नी कि कमी खलती मगर पोते पोतियो के प्यार मे सबकुछ भूल जाते office से आकर बेटा उनके पास बैठ घंटों बातें करता सलाह मशवरा करता वही बहू बेटी की तरह उनका भरपूर खयाल करती ... दोस्तों दुनिया कि सबसे अनमोल दौलत मां बाप है जो हमें दुनिया मे लाते हे वो हमारा नही, ब्लकि हम उनके शरीर का हिस्सा है दोस्तों ये दौलत कभी मत खोना।

Aarti Ki Kahani

Aarti Ki Kahani
आरती नामक एक युवती का विवाह हुआ और वह अपने पति और सास के साथ अपने ससुराल में रहने लगी। कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। सास पुराने ख़यालों की थी और बहू नए विचारों वाली। आरती और उसकी सास का आये दिन झगडा होने लगा। दिन बीते, महीने बीते. साल भी बीत गया. न तो सास टीका-टिप्पणी करना छोड़ती और न आरती जवाब देना। हालात बद से बदतर होने लगे। आरती को अब अपनी सास से पूरी तरह नफरत हो चुकी थी. आरती के लिए उस समय स्थिति और बुरी हो जाती जब उसे भारतीय परम्पराओं के अनुसार दूसरों के सामने अपनी सास को सम्मान देना पड़ता। अब वह किसी भी तरह सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी.

एक दिन जब आरती का अपनी सास से झगडा हुआ और पति भी अपनी माँ का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई। आरती के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे. उसने रो-रो कर अपनी व्यथा पिता को सुनाई और बोली – “आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये जो मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूँ नहीं तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी…” बेटी का दुःख समझते हुए पिता ने आरती के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – “बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर खिला कर मार दोगी तो तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी क्योंकि वो ज़हर मैं तुम्हें दूंगा. इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं होगा.” लेकिन आरती जिद पर अड़ गई – “आपको मुझे ज़हर देना ही होगा …. अब मैं किसी भी कीमत पर उसका मुँह देखना नहीं चाहती !” कुछ सोचकर पिता बोले – “ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता इसलिए जैसे मैं कहूँ वैसे तुम्हें करना होगा ! मंजूर हो तो बोलो ?”

“क्या करना होगा ?”, आरती ने पूछा. पिता ने एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बाँधकर आरती के हाथ में देते हुए कहा – “तुम्हें इस पुडिया में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है। कम मात्रा होने से वह एकदम से नहीं मरेगी बल्कि धीरे-धीरे आंतरिक रूप से कमजोर होकर 5 से 6 महीनों में मर जाएगी. लोग समझेंगे कि वह स्वाभाविक मौत मर गई.” पिता ने आगे कहा -“लेकिन तुम्हें बेहद सावधान रहना होगा ताकि तुम्हारे पति को बिलकुल भी शक न होने पाए वरना हम दोनों को जेल जाना पड़ेगा ! इसके लिए तुम आज के बाद अपनी सास से बिलकुल भी झगडा नहीं करोगी बल्कि उसकी सेवा करोगी। यदि वह तुम पर कोई टीका टिप्पणी करती है तो तुम चुपचाप सुन लोगी, बिलकुल भी प्रत्युत्तर नहीं दोगी ! बोलो कर पाओगी ये सब ?” आरती ने सोचा, छ: महीनों की ही तो बात है, फिर तो छुटकारा मिल ही जाएगा. उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुडिया लेकर ससुराल चली आई.

ससुराल आते ही अगले ही दिन से आरती ने सास के भोजन में एक चुटकी ज़हर रोजाना मिलाना शुरू कर दिया। साथ ही उसके प्रति अपना बर्ताव भी बदल लिया. अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती बल्कि क्रोध को पीकर मुस्कुराते हुए सुन लेती। रोज़ उसके पैर दबाती और उसकी हर बात का ख़याल रखती। सास से पूछ-पूछ कर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसकी हर आज्ञा का पालन करती। कुछ हफ्ते बीतते बीतते सास के स्वभाव में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया. बहू की ओर से अपने तानों का प्रत्युत्तर न पाकर उसके ताने अब कम हो चले थे बल्कि वह कभी कभी बहू की सेवा के बदले आशीष भी देने लगी थी। धीरे-धीरे चार महीने बीत गए. आरती नियमित रूप से सास को रोज़ एक चुटकी ज़हर देती आ रही थी। किन्तु उस घर का माहौल अब एकदम से बदल चुका था. सास बहू का झगडा पुरानी बात हो चुकी थी. पहले जो सास आरती को गालियाँ देते नहीं थकती थी, अब वही आस-पड़ोस वालों के आगे आरती की तारीफों के पुल बाँधने लगी थी। बहू को साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले भी जब तक बहू से चार प्यार भरी बातें न कर ले, उसे नींद नही आती थी। छठा महीना आते आते आरती को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं। उसे भी अपनी सास में माँ की छवि नज़र आने लगी थी।

जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी। इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली – “पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती … ! वो बहुत अच्छी हैं और अब मैं उन्हें अपनी माँ की तरह चाहने लगी हूँ!” पिता ठठाकर हँस पड़े और बोले – “ज़हर ? कैसा ज़हर ? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूर्ण दिया था … हा हा हा !!!” "बेटी को सही रास्ता दिखाये, माँ बाप का पूर्ण फर्ज अदा करे"

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