Hindi Story

Monday 18th of November 2019
sammanit nazar

Sammanit Nazar

"सम्मानित नजर "
निशा घर की छोटी बहु थी मोहन के साथ उसकी शादी को अभी सालभर ही हुआ था की मोहन के भाइयों ने मां को अपने साथ रखने से साफ इंकार कर दिया मोहन और निशा तो रहना ही मां के साथ चाहते थे मगर कुछ प्रोपटी के चलते बडे भैया ने ऐसा नही करने दिया मगर जब सबकुछ अपने नाम करवा लिया तो मां के लिए उनके घरमे कमरा नही बचा था कारण बच्चे बडे हो गए अलग अलग कमरों मे रहकर पढाई करेंगे वगैरह वगैरह.. खैर तबसे मां मोहन और निशा के पास आकर रहने लगी मोहन और निशा मां का भरपूर ख्याल रखते घरमे सबसे पहले बनने वाली सब्जी रोटी हो या बाहर से आनेवाली मिठाई या फल ...

सबसे पहले वो मां को दिया जाता उसके बाद मोहन निशा और उनकी बेटी आराध्या खाते ..आराध्या अक्सर अपने पापा से पूछती -पापा आप हर चीज पहले दादी को कयो देते हो तो मोहन मुसकराते कहता-बेटा ये हमारे बडो का सम्मान है ..देखो कल जब तुम बडी हो जाओगी तो सबसे पहले तुम अपने मम्मी पापा को प्यार करोगी सम्मान दोगी कयोंकि आज हम तुम्हें प्यार करते है सम्मान से रहना खाना सीखाते है वैसे ही ...आराध्या मुसकराते रह जाती ऐसे ही अक्सर कितनी बार मेहमान और दोस्त आते तो वो बुजुर्ग माता जी से पूछते -आपका बेटा बहु आपका ख्याल तो रखते है ना ...बहु ठीक से खिलाती हे या नही ...ये सब सुनकर निशा उदास हो जाती मोहन उसे समझाता-निशा हमें लोगों को दिखाने के लिए नही बल्कि अपनी मां के सम्मान और सेहत की फ्रिक करनी चाहिए जिसको देखना है ये सब यकीन जानो वो देख रहा है और निशा कहती-आप नही समझते लोगों को ...करने के बाद भी सुनना पडे तो कैसा लगता है ...

खैर एकदिन मोहन और निशा बेटी आराध्या सहित निशा की एक सहेली के घर खाने पर गए ...वहां निशा की सहेली ने मोहन और निशा सहित आराध्या के लिए तमाम बढिया स्वादिष्ट व्यंजनों का ढेर लगा दिया मगर मोहन और निशा से कुछ खाते नही बन रहा था कारण निशा की सहेली की बुजुर्ग सास....वहीं पास ही बैठी थी मगर निशा की सहेली ने उन्हें कुछ खाने को देना तो दूर पूछना तक मुनासिब नही समझा ...ये सब आराध्या बडे गौर से देख रही थी उसने तुंरत टोकते हुए कहा-मौसी जी... आप दादी को कुछ नही दे रही कया आप उनसे प्यार नही करती उनका सम्मान नही करती ...ये शब्द अचानक सुनकर निशा की सहेली और उसके पति की नजरें झुक गई तब आराध्या फिर बोली-मौसी जी ...हमारे घर मे तो मम्मी दादी को बहुत प्यार करती है बहुत सम्मान करती है सबसे उन्हें खिलाती है फिर हम खाते है यही तो आपके बच्चे यानि मेरे बहन भाई सीखेगे ..हे ना मौसी जी...निशा की सहेली और उसके पति कि आँखें शर्म से झुकी थी वहीं बुजुर्ग दादी आराध्या को मन ही मन मे दुआएं दे रही थी और आज सचमुच निशा को उसके सवाल का जबाब मोहन की कही बातो मे मिल गया था... जिसे देखना चाहिए वो देख रहा है.. वो लगातार मोहन को सम्मानित नजरों से निहार रही थी...

king on elephant

Aik raja hathi par

एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- *"मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।"* यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

अगले दिन, *मंत्री* उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। *अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाए। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।*

अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद *दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।* बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।

जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि *चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये।* राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

*जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।*

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।
*"कर्म क्या है?"*
*"हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ.।"*
*हमारे सोच विचारों से ही हमारे कर्म बनते हैं।*

mammi mammi mai

Mammi Mammi Mai

"मम्मी , मम्मी ! मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नही जाउँगा ना ही उसके साथ वापस आउँगा।"मेरे दस वर्ष के बेटे ने गुस्से से अपना स्कुल बैग फेकतै हुए कहा तो मैं बुरी तरह से चौंक गई। यह क्या कह रहा है? अपनी दादी को बुढिया क्यों कह रहा है? कहाँ से सीख रहा है इतनी बदतमीजी? मैं सोच ही रही थी कि बगल के कमरे से उसके चाचा बाहर निकले और पुछा-"क्या हुआ बेटा?" उसने फिर कहा -"चाहे कुछ भी हो जाए मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नहीं जाउँगा। हमेशा डाँटती है और मेरे दोस्त भी मुझे चिढाते हैं।" घर के सारे लोग उसकी बात पर चकित थे।

घर मे बहुत सारे लोग थे। मैं और मेरे पति,दो देवर और देवरानी , एक ननद , ससुर और नौकर भी। फिर भी मेरे बेटे को स्कुल छोडने और लाने की जिम्मेदारी उसके दादी की थी। पैरों मे दर्द रहता था पर पोते के प्रेम मे कभी शिकायता नही करती थी।बहुत प्यार करती थी उसको क्योंकि घर का पहला पोता था। पर अचानक बेटे के मुँह से उनके लिए ऐसे शब्द सुन कर सबको बहुत आश्चर्य हो रहा था। शाम को खाने पर उसे बहुत समझाया गया पर बह अपनी जिद पर अडा रहा पति ने तो गुस्से मे उसे थप्पड़ भी मार दिया। तब सबने तय किया कि कल से उसे स्कुल छोडने और लेने माँजी नही जाएँगी । अगले दिन से कोई और उसे लाने ले जाने लगा पर मेरा मन विचलित रहने लगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? मै उससे कुछ नाराज भी थी।

शाम का समय था ।मैने दुध गर्म किया और बेटे को देने के लिए उसने ढुँढने लगी।मैं छत पर पहुँची तो बेटे के मुँह से मेरे बारे मे बात करते सुन कर मेरे पैर ठिठक गये । मैं छुपकर उसकी बात सुनने लगी।वह अपनी दादी के गोद मे सर रख कर कह रहा था- "मैं जानता हूँ दादी कि मम्मी मुझसे नाराज है।पर मैं क्या करता? इतनी ज्यादा गरमी मे भी वो आपको मुझे लेने भेज देते थे।आपके पैरों मे दर्द भी तो रहता है।मैने मम्मी से कहा तो उन्होंने कहा कि दादी अपनी मरजी से जाती हैं। दादी मैंने झुठ बोला।बहुत गलत किया पर आपको परेशानी से बचाने के लिये मुझे यही सुझा। आप मम्मी को बोल दो मुझे माफ कर दे।" वह कहता जा रहा था और मेरे पैर तथा मन सुन्न पड़ गये थे। मुझे अपने बेटे के झुठ बोलने के पीछे के बड़प्पन को महसुस कर गर्व हो रहा था।

मैने दौड कर उसे गले लगा लिया और बोली-"नहीं , बेटे तुमने कुछ गलत नही किया। हम सभी पढे लिखे नासमझो को समझाने का यही तरीका था। धन्यवाद बेटा।

do bhai

Do Bhai

भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।* "क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो?" *" नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं । "* अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला। *"छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।"* " बस भैया", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।

"अपना मकान", " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे। *भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल।* लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। *इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।* प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।

*पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।* *मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये।* वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। *दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।"* इतवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। *मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर।* हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"

*मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका।* तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।" *लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।" यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"*

हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, *" भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे।"*

*पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था।*

khuddari hindi story

Khuddari Hindi Story

दो जवान बेटे मर गए। दस साल पहले पति भी चल बसे। दौलत के नाम पर बची एक सिलाई मशीन। सत्तर साल की बूढी ममता गाँव भर के कपड़े सिलती रहती। बदले में कोई चावल दे जाता , तो कोई गेहूँ या बाजरा।

सिलाई करते समय उसकी कमजोर गर्दन डमरू की तरह हिलती रहती। दरवाजे के सामने से जो भी निकलता वह उसे ‘ राम – राम ‘ कहना न भूलती। दया दिखाने वालों से उसे हमेशा चिढ रहती। छोटे – छोटे बच्चे दरवाजे पर आकर ऊधम मचाते , लेकिन ममता उनको कभी बुरा भला न कहकर उल्टे खुश होती। प्रधान जी कन्या पाठशाला के लिए चन्दा इकट्ठा करने निकले ,तो ममता के घर की हालत देखकर पिघल गए — क्यों दादी , तुम हाँ कह दो, तो तुम्हे बुढ़ापा पेंशन दिलवाने की कोशिश करूँ।

ममता घायल – सी होकर बोली_ भगवान ने दो हाथ दिए हैं। मेरी मशीन आधा पेट रोटी दे ही देती है। मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँगी। क्या तुम यही कहने आये थे ? मैं तो कन्या पाठशाला बनवाने के लिए चन्दा लेने आया था। पर तेरी हालत देखकर। तू कन्या पाठशाला बनवाएगा ? ममता के झुर्रियों भरे चेहरे पर सुबह की धूप -सी खिल गई। हाँ , एक दिन जरूर बनवाऊँगा दादी। बस तेरा आशीष चाहिए।” ममता घुटनों पर हाथ टेक कर उठी। ताक पर रखी जंग खाई संदूकची उठा लाई। काफी देर उलट -पुलट करने पर बटुआ निकला। उसमें से तीन सौ रुपये निकालकर प्रधान जी की हथेली पर रख दिए _बेटे , सोचा था मरने से पहले गंगा नहाने जाऊँगी। उसी के लिए जोड़कर ये पैसे रखे थे।

तब ये रुपये मुझे क्यों दे रही हो ? गंगा नहाने नहीं जाओगी ?
बेटे , तुम पाठशाला बनवाओ। इससे बड़ा गंगा – स्नान और क्या होगा”-कह कर ममता फिर कपड़े सीने में जुट गई।

pati patni ki baat cheet

Pati Patni Ki Baat Cheet

*पति-पत्नी का खूबसूरत संवाद...✍👌👍*

*मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा- क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं बार-बार तुमको कुछ भी बोल देता हूँ, और डाँटता भी राहत हूँ, फिर भी तुम पति भक्ति में ही लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता..??* *मैं भारतीय संस्कृति के तहत वेद का विद्यार्थी रहा हूँ और मेरी पत्नी विज्ञान की, परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा हैं, क्योकि मैं केवल पढता हूँ और वो जीवन में उसका अक्षरतः पालन भी करती है।* *मेरे प्रश्न पर जरा वह हँसी और गिलास में पानी देते हुए बोली- यह बताइए कि एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है, परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नहीं कहा जा सकता ना!!!*

*मैं सोच रहा था, आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी। मैंने फिर प्रश्न किया कि ये बताओ, जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है..?* *मुस्कुरातें हुए उसने कहा- आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी...* *मैं झेंप गया और उसने कहना प्रारम्भ किया...दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है...ऊर्जा और पदार्थ।* *पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ की। पदार्थ को यदि विकसित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है, ना की ऊर्जा पदार्थ का। ठीक इसी प्रकार जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाले पीढ़ियों अर्थात् अपने संतानों के लिए प्रथम पूज्या हो जाती है, क्योंकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है।*

*मैंने पुनः कहा- तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई ना, क्योंकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो..?* *अब उसने झेंपते हुए कहा- आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते हैं। आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ...ये तो सम्पूर्णतया कृतघ्नता हो जाएगी।* *मैंने कहा- मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नहीं..?*

*उसका उत्तर सुन मेरे आँखों में आँसू आ गए...उसने कहा- जिसके साथ संसर्ग करने मात्र से मुझमें जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई और ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया जिसे माता कहते हैं, उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती। फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा कि यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता...मैं तो माता सीता की भाँति लव-कुश तैयार कर दूँगी, जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे।*

*🙏सहस्त्रों नमन है सभी मातृ शक्तियों को, जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बाँध रखा है...🙏*

aa gayi tum

Aa Gayi Tum

दोस्त " खट खट... आ गई तुम ... आओ अंदर आओ नितिन ने सुधा से कहा ..... सकुचाती घबराती सुधा अपने बांस के कहने पर उससे मिलने एक होटल रूम में पहुँची थी दिल और दिमाग के बीच झूलती सुधा अपने बेटे रेहान की जान बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थी उसे अपने बेटे के कैंसर के इलाज के लिए 10लाख रुपए का कर्ज चाहिए था पति रहा नही था एक विधवा office मे काम करके जैसे तैसे गुजर बसर कर रही थी की बेटे को कैंसर जैसी बीमारी ने घेर लिया सब जगह से निराश हो चुकी सुधा बस office का एक साथी दोस्त मोहन कुछ कोशिश कर रहा था मगर अबतक वो भी नाकाम था आखिर सुधा ने बांस से विनती की तो उसने एक शर्त रखी मदद की.. और शर्त थी वो होटल का कमरा था जहां सुधा को अपने बांस के साथ कुछ वक्त बिताना था दिमाग कहता यह गलत है पर बेटे का बीमार चेहरा आँखों के सामने आते ही दिल उसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता अजीब से कशमकश में उलझी सुधा के कदम कब उसे उस रूम तक ले आए उसे पता ही नहीं चला जैसे ही बांस ने उसके असंतुलित मन मस्तिष्क का फायदा उठाना चाहा ,उसी वक्त अचानक से सुधा को एक call आई -मैडम आपकी किडनी मैच हो गई है

"यू कैन डोनेट दैट..उस callके बाद सुधा के विचारों पर पड़ी धूल छट गई और अब उसे सब कुछ साफ साफ नजर आ रहा था अब उसके मन और मस्तिष्क से एक ही आवाज आ रही थी कि अस्मिता को बेचने से बेहतर है कि किडनी को ही ... और तेज कदमों से बाहर जाने को हुई तो नितिन ने उसका रास्ता रोककर कहा -हाथ आया शिकार कैसे जाने दूं भले ही तुमहारी प्रोब्लम सोल्व हो गई हो मगर मे प्यासा हूं ओर इतना खर्चा किया देखो जरा कमरे को..... सुधा गिडगिडाने लगी मगर नितिन ने उसपर हमला कर दिया तभी कमरे की बेल फिर से बजी ..सुधा खुदको सिमेटती दूर हुई नितिन ने दरवाजा खोला तो सामने मोहन खडा था वो भी उसीके office मे काम करता था नितिन मोहन को देखकर बोला-तुम... तुम यहां कैसे ..

सुधा मोहन को देखकर भागकर रोती उससे लिपट गई मोहन ने उसे चुप कराते कहा -सप्राइज सर..नितिन मोहन को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था तभी नितिन की पत्नी आकृति वहां आ गई मोहन ने आकृति से कहा-देखिए भाभीजी सुधा और मैने कैसे सजावट की आप दोनों के लिए ..आकृति नितिन से आकर लिपट गई और सप्राइज के लिए थैंकयू कहने लगी घबराहट भरे नितिन ने भी हां मे हां मिलाते मोहन सुधा को थैंकयू कहा ओर दोनों ने बांय कहकर कमरे से रवानगी कर ली ..सुधा बोली-मोहन तुम.... यहां कैसे .... मोहन-रेहान के इलाज के लिए अपनी बाइक और मां की आखिरी निशानी उनका घर बेचकर..... लेकिन जब अस्पताल पहुंचा तो तुम्हें आटो से होटल आता देख ओर यहां नितिन सर को देखकर सब समझ गया.. बस मैने तुम्हें बचाने को पहले फोन किया ओर भाभी को नितिन सर सप्राइज देने का कहकर यहां बुला लिया ..आखिर हम दोनों दोस्त है ओर दोस्त ही दोस्त के काम आता है कहकर दोनों अस्पताल को चल दिए..

ladki hui hai

Ladki Hui Hai

लड़की हुई है -----

लड़की हुई है? पति ने पूछा... पत्नी को इसी प्रश्न की उम्मीद थी, उसने उम्मीद नहीं की थी कि पति सबसे पहले उसका हाल चाल जानेगा। पत्नी ने सिर्फ पलके झुका दी, पति इसे हाँ समझे या हाँ से ज्यादा कुछ और, लेकिन पत्नी के पलके झुका देने भर में इतनी दृढ़ता थी कि वह कह देना चाहती है कि हाँ लड़की हुई है और वह इसे पालेगी, पढ़ाएगी ! अब क्या करेगी तू? पति ने पूछा... पालूंगी, और क्या करुँगी.... शादी कैसे करेगी ? ,

अभी तो पैदा हुई है जी , शादी के नाम पर अभी क्यों सूखने पढ़ गये आप.... तू जैसे जानती नहीं, तीन तीन बेटिया हो गयी हैं, हाथ पहले से टाइट है, शादी कोई ऐसे ही तो हो नहीं जाती ! कहा था टेस्ट करा लेते है, लेकिन सरकार भी जीने नहीं देती साली, मन क्यों छोटा करते हैं जी आप ,भगवान् ने भेजी है, अपने आप करेगा इंतजाम, पत्नी ने दिलासा दिया... भगवान! हा हा। भगवान ने ही कुछ करना होता तो लड़का न दे देता ! कुछ जीने का मकसद तो रहता, साले ने काम धंधे में भी ऐसी पनोती डाली है की रोटी तक पूरी नहीं होती! ऊपर से तीन तीन बेटिया और ये नंगा समाज !

पत्नी प्रसव पीड़ा भूल गयी थी, पति की पीड़ा उसे बड़ी लगने लगी एकाएक ! उसने पति की झोली में बेटी डाल दी ! कंधे पर हाथ रख कर रुंधे गले से बोली! गला घोंट देते हैं ! अभी किसी को नहीं पता की जिन्दा हुई है या मरी हुई, दाई को मैं निबट लूंगी ! पति का बदन एक दम से सन्न पड़ गया, वह कभी पत्नी के कठोर पड़ चुके चेहरे की ओर देखता तो कभी नवजात बेटी के चेहरे को ! उसने एकाएक बेटी को सीने से लगा लिया! भीतर प्रकाश का बड़ा सूरज चमकने लगा! बेटी ने पिता के कान में कह दिया था पापा आप चिंता न करें मैं आपके टाइट हाथ खोलने के लिए ही आई हूं। पिता के सीने से लगी बेटी को देखकर पत्नी की आँखे आंसुओ से टिमटिमाने लगी, पति ने आगे बढ़कर पत्नी के आंसू पोंछे और भीतर लम्बी सांस भर कर बोला, हम इसे पालेंगे पार्वती..! 🙏🙏🙏🙏🙏

prernadayak kahaniya

Prernadayak Kahaniya

प्रेरणादायीं लेख

~~~~~~~~~~ माँ की मृत्यु के बाद तीसरा दिन था । घर की परंपरा के अनुसार, मृतक के वंशज उनकी स्मृति में अपनी प्रिय वस्तु का त्याग किया करते थे। मैं आज के बाद बैंगनी रंग नही पहनूँगा।” बड़ा बेटा बोला । वैसे भी जिस ऊँचे ओहदे पर वो था, उसे बैंगनी रंग शायद ही कभी पहनना पड़ता। फिर भी सभी ने तारीफें की।.. मँझला कहाँ पीछे रहता, “मैं ज़िदगी भर गुड़ नही खाऊँगा।” ये जानते हुए भी कि उसे गुड़ की एलर्जी है, पिता ने सांत्वना की साँस छोड़ी।

अब सबकी निगाहें छोटे पर थी। वो स्तब्ध सा माँ के चित्र को तके जा रहा था। तीनों बेटों की व्यस्तता और अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता के चलते, माँ के अंतिम समय कोई नहीं पहुँच पाया था। सब कुछ जब पिता कर चुके, तब बेटों के चरण घर से लगे। “मेरे तीन बेटे और एक पति, चारों के कंधों पर चढ़कर श्मशान जाऊँगी मैं।” माँ की ये लाड़ भरी गर्वोक्ति कितनी ही बार सुनी थी उसने और आज उसका खोखलापन भी देख लिया । “बोलिये समीर जी,” पंडितजी की आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई।

आप किस वस्तु का त्याग करेंगे अपनी माता की स्मृति में ?” बिना सोचे वो बोल ही तो पड़ा था, “पंड़ितजी, मैं अपने थोड़े से काम का त्याग करूंगा, थोड़ा समय बचाऊंगा और अपने पिताजी को अपने साथ ले जाऊंगा।”और पिता ने लोक-लाज त्यागकर बेटे की गोद में सिर दे दिया था। हमें उम्मीद है ये कहानी क्या सिखाती है , आप सभी समझ गये होंगे ..फिर भी आखिर में दो लाइनें सभी युवा दोस्तों के लिये लिख रहा हूँ जिसे मैं खुद हमेशा अपने दिमाग में रखता हूँ ।

"अपने कीमती समय से थोड़ा समय अपने परिवार के लिये, बडे-बुजुर्गों के लिए भी निकालिये,क्योंकि शायद जब आपके पास समय होगा तब, आपके पास ये खूबसूरत सा परिवार नहीं होगा.."

jam kya hai

Janm Kya Hai

जन्म_क्या_है?

जन्म वह भावनाओं का सैलाब होता है जो किसी के पैदा होते ही पैदा होने वाले से जुड़े लोगों को अपने भावनाओं में बहा कर ले जाता है,जन्म वो एकमात्र दिन है जब आप पैदा हुए तो आपके रोने पे माँ मुस्कुराई थी उसके बाद सृष्टि ने वो दिन नहीं देखा जब आपके रोने पे माँ मुस्कुराई हो! जन्म सबका शायद किसी मकसद के लिए होता है? पर इस मकसद का हर किसी जन्म लेने वाले को पता ही नहीं होता शायद जन्म लेने वाले जन्म लेते हैं निर्भर हो जाते हैं जन्म देने वालों के ऊपर और तब तक निर्भर रहते हैं,जब तक वह खुद आत्मनिर्भरता की अवस्था में नहीं पहुंचते।

इस दुनिया के 99% लोग कभी यह नहीं सोच पाते कि तुम्हारा जन्म किस लिए हुआ है तुम किस मकसद से इस दुनिया में आए हो और किन कारणों से तुम्हारा जन्म सिद्ध होगा या तुम्हारा जन्म लेना सफल होगा? जन्म देकर किसी के जन्म को सफल करने वाली जननी कि प्रसव पीड़ा के दौरान उस का घुटता हुआ दम टूटती हुई सांसे शायद किसी मकसद के लिए किसी को जन्म देते समय जद्दोजहद कर रही होती हैं! और एक नन्ही सी किलकारी के साथ रोने की आवाज के साथ अपनी उखड़ी हुई सांसे भूल वह जननी नवजात के जन्मने पर उसके रोते समय मुस्कुराती है परंतु इस बात की साक्षी कुदरत होती है या कोई उनके सामने खड़ा हुआ इंसान इस बात को समझ पाता है और इस कठिन अनुभव से गुजरने वाली उस जननी से बेहतर जन्म देने के महत्व को शायद ही कोई और दूसरा समझ पाएगा कि एक मां जन्म देते समय कितनी पीड़ा में होती है ।

एक जननी का जन्म देना ही मकसद होता है और वह जन्म देती है परंतु जन्म लेने वाले को अपने मकसद का भान नहीं होता कि तुम्हारा जन्म किस लिए हुआ है जिस दिन जन्म देने वाली जननी की तरह जन्म लेने वाले भी अपने मकसद को समझने लगे तो शायद जन्म देने वाली और जन्म लेने वाले दोनों समकक्ष खड़े दिखेंगे और दुनिया मैं लोगों का नजरिया कुछ अलग ही होगा। जन्म को लेकर तमाम बातें या भ्रांतियां कह लो या कपोल कल्पना कह सकते हैं सुनने को मिलती है की लाख 84 योनियों के बाद इंसान के रूप में कोई जन्म लेता है इतनी कठिन दौड़ के बाद एक इंसानी रूप में पैदा होने वाले प्राणी अपने जन्म का महत्व नहीं समझ पाते इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है।

जिस तरह से जन्म देने वाली ने अपने जन्म देने वाले मकसद से इंसानों को जन्म दिया है उस मकसद से इंसान रूबरू होकर अपने जन्म लेने के मकसद को जान ले तो बेहतर होगा नहीं तो जिस तरह से जन्म लिया है उसी तरह इस दुनिया से रवानगी भी होगी, इंसानों का खेल केवल ढाई किलो वजन पर ही टिका हुआ है पैदा होकर भी लोग ढाई किलो के इस दुनिया में लोग आते हैं, उसी तरह एक लोटे में ढाई किलो हस्तियों में ही सिमट कर चले जाते हैं।
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