mere intezar me kavita kosh

वो दिन भी आयेगा मेरे इंतज़ार में 

जब तुम खडी होगी नज़रें बार बार 

रास्ते पर उठ रही होंगी घड़ी की सुईयां 

अटकी हुयी लगेंगी दिल की धडकनें 

बढ़ रही होंगी चेहरे पर पसीना 

माथे पर सलवटें होंगी तुम्हें उन हालात का 

अहसास होने लगेगा तुम्हारे इंतज़ार में 

जो मैंने सहा होगा प्रीत से मिलन की आस 

कुछ ऐसी ही होती है जिसने सही 

उसे ही महसूस होती है

Kavita Kosh कविता कोश

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