Muhammad Iqbal

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मत कर खाक के पत्ते पर गुरूर वबे न्याजी इतनी 

खुद को खुद में झांक कर देख तुझ में रक्खा क्या है 

by Muhammad Iqbal
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हमने तन्हाई को अपना बना रक्खा 

राख के ढ़ेर ने शोलो को दबा रक्खा है 

by Muhammad Iqbal
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मेरा उस शहरे अदावत में बसेरा है ऐ इकबाल 

जहाँ लोग सिजदो में लोगो का बुरा सोचते है 

by Muhammad Iqbal
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मुझे इश्क के पर लगा कर उड़ा 

मेरी खाक जुगनू बना के उड़ा 

by Muhammad Iqbal
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दिल से जो बात  निकली है असर रखती है 

पर नहीं ताकत -ए-परवाज मगर रखती है 

by Muhammad Iqbal
mohammad allama iqbal sare jahan se acha hindustan hamara

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सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा 

 

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा 

 

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का

वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा 

 

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ

गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा 

 

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको

उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा 

 

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा 

 

यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा 

 

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा 

 

'इक़बाल' कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में

मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा 

 

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा

 

by Muhammad Iqbal