Nafrat Shayari


apni nafrto ke

अदावत तो है अपनी नफरतों के रहनुमाओं से

जो दिल में दे जगह उससे भला न क्यूँ सुलह कर लें

wo dushman bankar

वो दुश्मन बनकर मुझे जीतने निकले थे

मुहब्बत कर लेते मै खुद ही हार जाता 

hmare zikr se bhi nafrat hai

कभी उसने भी हमें चाहत का पैगाम लिखा था

सब कुछ उसने अपना हमारे नाम लिखा था

सुना है आज उनको हमारे जिक्र से भी नफ़रत है

जिसने कभी अपने दिल पर हमारा नाम लिखा था

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