Dhoka Shayari

dhoka deti hai

धोखा देती है अक्सर मासूम चेहरे की चमक,

हर काँच के टुकड़े को हीरा नहीं कहते

1 माह
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dhoka bhi

धोखा भी बादाम की तरह है 

जितना खाओगे उतनी अक्ल आती है

 

1 माह
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es kadar dhokha

मैंने खाया है चिरागों से इस कदर धोखा,

मै जल रहा हूँ सालों से मगर रौशनी नहीं होती

1 माह
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dhokha hi de dete

कुछ लोग इतने गरीब होते है की, 

देने के लिए कुछ नहीं होता तो धोखा दे देते है

1 माह
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mujhe dhoka diya

तकलीफ ये नही की किस्मत ने मुझे धोखा दिया,

मेरा यकीन तुम पर था किस्मत पर नही

1 माह
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janta tha wo dhoka

जानता था की वो धोखा देगी एक दिन पर चुप रहा क्यूंकि उसके धोखे में जी सकता हूँ पर उसके बिना नहीं 

1 माह
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dhokha khane lge hai log

इश्क में इसलिए भी धोखा खानें लगें हैं लोग

दिल की जगह जिस्म को चाहनें लगे हैं लोग

1 माह
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dhokha diya tha jab tune mujhe

धोखा दिया था जब तूने मुझे. 

जिंदगी से मैं नाराज था,

सोचा कि दिल से तुझे निकाल दूं. 

मगर कंबख्त दिल भी तेरे पास था

1 माह
from Dhoka Shayari

kaise dhokha kha baithe

अनजाने में यूँ ही हम दिल गँवा बैठे,

इस प्यार में कैसे धोखा खा बैठे,

उनसे क्या गिला करें.. भूल तो हमारी थी

जो बिना दिलवालों से ही दिल लगा बैठे

1 माह
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dhokha nahi mila

कौन है इस जहाँ मे जिसे धोखा नहीं मिला,

शायद वही है ईमानदार जिसे मौक़ा नहीं मिला.

1 माह
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